Thursday, November 24, 2022

खाद्य जाल (Food Web)

खाद्य जाल (Food Web)

अधिकांश पारिस्थितिक तन्त्र में अनेक प्रकार के उत्पादक एवं उपभोक्ता होते हैं। इस प्रकार से कई खाद्य श्रृंखलाएँ एक-दूसरे से सम्बन्धित होती हैं तथा एक प्रकार का जाल-सा बना लेती हैं, जिसे खाद्य जाल (Food web) कहते हैं। खाद्य में पाये जाने वाले जीव विभिन्न स्तरों में एक दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। उपलब्ध भोजन के आधार पर प्रत्येक स्तर पर विभिन्न जीव निम्न स्तर के एक से अधिक जीवों पर निर्भर करते हैं। चूहा कई प्रकार के तने, जड़, फल व बीज खाता है। साँप चूहों का शिकार करता है तथा गिद्ध साँप का शिकार करता है। साँप, मेढक व चूहे दोनों को खाता है। इस प्रकार से यह जटिल खाद्य श्रृंखला एक खाद्य जाल (Food web) का निर्माण करता है।

पारिस्थितिक तन्त्र में खाद्य जाल की जितनी अधिक खाद्य शृंखलाओं के रूप में वैकल्पिक युक्तियाँ होती हैं, उतना ही अधिक जीवित प्राणियों का स्थिर समुदाय होगा। जैसे- यदि किसी क्षेत्र में शशक कम हो जायें तो क्या उसका शिकार करने वाले द्वितीयक उपभोक्ता बाज़ पक्षी भी कम हो जाएँगे। वास्तव में ऐसा नहीं होता है, क्योंकि शशक के कम होने से वनस्पतियों को अधिक उगने का मौका मिलेगा, जिससे फल व बीज अधिक उत्पन्न होंगे। परिणामस्वरूप उस स्थान पर चूहे अधिक उत्पन्न होंगे और बाज शशक के स्थान पर चूहों को खाने लगेंगे और बाज अपनी संख्या को बनाये रखेंगे। इस प्रकार से खाद्य जाल के जितने अधिक वैकल्पिक रास्ते होंगे उतने ही जीव समुदाय स्थिर होंगे तथा पारिस्थितिक तन्त्र सन्तुलित रहेगा।

पारिस्थितिकी तंत्र में विभिन्न खाद्य श्रंखला मिलकर एक जाल का निर्माण करती हैं जिसे खाद्य जाल कहते हैं। इसमें खाद्य ऊर्जा का प्रवाह विभिन्न दिशाओं में होता है। एक खाद्य श्रंखला का संबंध दूसरी खाद्य श्रृंखला से होता है। विभिन्न पोषण स्तर से भोजन प्राप्त होता है।

घास खरगोश बाज
घास टिडडा बाज
घास टिडडा छिपकली बाज
घास चूहा बाज
घास चूहा सांप बाज
घास- बकरी- मनुष्य

ऊपर बताए गए उदाहरण में बाज खरगोश को खा सकता है। इसके साथ ही टिड्डे को खा सकता है पर यह भी हो सकता है कि पहले टिड्डा घास का खाये। फिर टिड्डा को छिपकली खाये। उसके बाद बाज उसे खाए। इसी तरह यह भी संभव है कि चूहा घास खाये, सांप चूहे को खाए। बाज सांप को खाये। इस तरह यह देखने को मिलता है कि जीव विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं से अपना भोजन प्राप्त करते हैं।

खाद्य श्रृंखला Food chain

खाद्य श्रृंखला के अंतर्गत उत्पादक, प्रथम उपभोक्ता, द्वितीय उपभोक्ता आते हैं। यह श्रृंखला पौधों से शुरू होती है। पौधों को टिड्डा खरगोश हिरन जैसे जीव खाते हैं। फिर उन जीवो को दूसरे जीव खाते हैं।

इस तरह एक चक्र चलता रहता है। खाद्य श्रृंखला में 10% ऊर्जा आगे बढ़ती है जबकि 90% ऊर्जा विलुप्त हो जाती है। अधिकतर खाद्य श्रृंखला में 4-5 कड़ियाँ होती हैं। पारिस्थितिकी तंत्र में सभी जीव एक दूसरे पर निर्भर होते हैं।

पेड़ पौधे सूर्य के प्रकाश, प्रकाश संश्लेषण और जल के द्वारा अपना भोजन बनाते हैं। पहले स्तर पर शाकाहारी जीव आते हैं जो पेड़ पौधों को खाते हैं इसलिए पौधों को उत्पादक कहा जाता है।

उत्पादक Producers

इसके अंतर्गत ऐसे जीव जंतु आते हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वनस्पतियों पर निर्भर है।

प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता Primary Consumers

इसके अंदर भेड़, बकरी, हाथी, हिरण, गाय, खरगोश, चूहा, बंदर जैसे शाकाहारी जीव आते हैं। शाकाहारी जीव अपने भोजन के लिए पेड़ पौधों वनस्पतियों पर निर्भर होते हैं। वे पेड़ पौधे या उनके फल खाकर जीवित रहते हैं।

द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता Secondary Consumers

इस श्रेणी में वे सभी जीव आते हैं जो प्रथम उपभोक्ताओं पर निर्भर रहते हैं। इस तरह के जीव मांसाहारी होते हैं और प्रथम उपभोक्ताओं को भक्षण कर जीवित रहते हैं। इसमें मेंढक, मछलियां, कीट खाने वाले पक्षी, छिपकली जैसे जीव जंतु होते हैं,

तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता Tertiary Consumers

इसके अंदर वह सभी जीव आते है जो भोजन के लिए द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ताओं पर निर्भर करते हैं। जैसे भालू, गीदड़, लोमड़ी, शेर आदि।

अपघटक Decomposers or Saprophytes

इसके अंतर्गत सूक्ष्मजीव आते हैं जो मृत जीव जंतु और वनस्पतियों को आहार बनाकर सूक्ष्म अवयवों में तोड़ देते हैं। उन्हें सड़ाकर नष्ट कर देते हैं। मृत भक्षी जीव दूसरे मृत जीव जंतुओं को खाकर कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फेट, फास्फेट, नाइट्रोजन, जल को मुक्त करते हैं।

पारिस्थितिकी तंत्र के घटक

अजैविक घटक

इसके अंतर्गत ताप, वर्षा, वायु, जल, वातावरण, प्रकाश, खनिज जैसे तत्व आते हैं।

जैविक घटक

इसके अंतर्गत उत्पादक और उपभोक्ता आते हैं।

खाद्य श्रृंखला और खाद्य वेब के बीच मुख्य अंतर

  1. खाद्य श्रृंखला को एकल सीधा मार्ग कहा जा सकता है, जिसके माध्यम से निम्न ट्रॉफिक स्तर से उच्च ट्रॉफिक स्तर तक ऊर्जा का प्रवाह होता है। फूड वेब को कई खाद्य श्रृंखलाओं के जटिल अंतर्संबंध के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसके माध्यम से पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह होता है।
  2. फूड चेन में केवल एक सीधी चेन होती है, जबकि फूड वेब में इंटरकनेक्टेड फूड चेन की संख्या होती है
  3. फूड वेब की तुलना में, खाद्य श्रृंखला में बहुत ओ एफ अस्थिरता है, और यह अलग और सीमित खाद्य श्रृंखलाओं की बढ़ती संख्या के कारण है। जबकि खाद्य वेब में स्थिरता है और यह जटिल खाद्य श्रृंखलाओं की उपस्थिति के कारण बढ़ता है।
  4. जैसा कि खाद्य श्रृंखला में, 4-6 ट्राफिक स्तर केवल विभिन्न प्रजातियों के होते हैं, और किसी भी स्तर पर कोई भी गड़बड़ी पूरी श्रृंखला को परेशान कर सकती है। खाद्य वेब में दूसरी ओर एक प्रजाति की विभिन्न आबादी के कई ट्राफिक स्तर की भागीदारी में और इसलिए किसी भी ट्रॉफिक स्तर पर जीवों के किसी भी समूह को हटाने पर यह खाद्य वेब को प्रभावित नहीं करता है।
  5. खाद्य श्रृंखला में, आमतौर पर उच्च ट्रॉफिक स्तर का सदस्य निम्न ट्रॉफिक स्तर के एकल प्रकार के जीवों पर निर्भर करता है या खिलाता है।
    इसके विपरीत, खाद्य वेब में, उच्च ट्रॉफिक स्तर के सदस्य निम्न ट्राफिक स्तर के जीव के कई अलग-अलग प्रकारों पर निर्भर करते हैं या फ़ीड करते हैं।

6.     तुलना चार्ट

तुलना के लिए आधार

खाद्य श्रृंखला

वेब भोजन

अर्थ

निचले ट्रॉफिक स्तर से उच्च ट्रॉफिक स्तर तक एक एकल सीधे मार्ग के माध्यम से ऊर्जा के प्रवाह को खाद्य श्रृंखला कहा जाता है।

परस्पर, कई खाद्य श्रृंखलाएं जिनके माध्यम से पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा प्रवाह को खाद्य वेब कहा जाता है।

जंजीरों की संख्या

इसमें केवल एक सीधी श्रृंखला होती है।

इसमें कई परस्पर खाद्य श्रृंखलाएं शामिल हैं।

स्थिरता

अलग और सीमित खाद्य श्रृंखलाओं की बढ़ती संख्या के कारण अस्थिरता बढ़ती है।

जटिल खाद्य श्रृंखलाओं की उपस्थिति के कारण स्थिरता बढ़ जाती है।

के कारण गड़बड़ी पैदा होती है

यहां तक ​​कि अगर एक जीव का एक समूह परेशान करता है, तो पूरी श्रृंखला प्रभावित होगी।

जीवों के एक समूह को हटाने से खाद्य वेब परेशान नहीं होता है।

पर खिलाओ

आमतौर पर, उच्च ट्रॉफिक स्तर का सदस्य निम्न ट्रॉफिक स्तर के एकल प्रकार के जीवों पर निर्भर करता है या खिलाता है।

फूड वेब में, उच्च ट्रॉफिक स्तर के सदस्य निचले ट्रॉफिक स्तर के कई अलग-अलग प्रकार के जीवों पर निर्भर करते हैं या खिलाते हैं।

पौष्टिकता स्तर

खाद्य श्रृंखला में विभिन्न प्रजातियों के केवल 4-6 ट्राफिक स्तर होते हैं।

खाद्य वेब में प्रजातियों की विभिन्न आबादी के कई ट्राफिक स्तर होते हैं।

प्रकार

1. चरागाह खाद्य श्रृंखला।
2.
डेट्राइटस खाद्य श्रृंखला।

कोई प्रकार नहीं

 

Wednesday, November 23, 2022

पारिस्थितिक तंत्र

 

पारिस्थितिक तंत्र की अवधारणा, घटक तथा कार्यात्मक स्वरूप

सम्पूर्ण पृथ्वी अर्थात स्थल, जल तथा वायु मण्डल एवं इस पर निवास करने जीव एक विशिष्ट चक्र या प्रणाली अथवा तन्त्र में परिचालित होते रहते हैं तथा प्रकृति अथवा पर्यावरण के साथ अपूर्व सामन्जस्य स्थापित करके न सिर्फ अपने को अस्तित्व में रखते हैं वरन पर्यावरण को भी स्वचालित करते हैं। इस तरह रचना तथा कार्य की दृष्टि से जीव समुदाय और वातावरण एक तन्त्र के रूप में कार्य करते हैं, इसी को 'इकोसिस्टम' या पारिस्थितिकतन्त्र के नाम से संबोधित किया जाता है। प्रकृति स्वयं एक विस्तृत तथा विशाल पारिस्थितिकतन्त्र है, जिसे 'जीव मण्डल' के नाम से पुकारा जाता है। सम्पूर्ण जीव समुदाय तथा पर्यावरण के इस अन्तर्सम्बन्ध को 'इकोसिस्टम' का नाम सर्वप्रथम ए.जी. टेन्सले ने 1935 में दिया। उन्होंने इसे परिभाषित करते हुए लिखा– “पारिस्थितिकतन्त्र वह तन्त्र है जिसमें पर्यावरण के जैविक तथा अजैविक कारक अन्तर्सम्बन्धित होते हैं । 'Ecosystem' दो शब्दों से बना है अर्थात 'cco' जिसका अर्थ है पर्यावरण जो ग्रीक शब्द 'Oikos' का पर्याय है जिसका अर्थ है 'एक घर' तथा दूसरा 'system' जिसका अर्थ है व्यवस्था या अन्तर्सम्बन्ध या अन्तर्निर्भरता से पैदा एक व्यवस्था जो छोटीबड़ी इकाइयों में विभक्त विभिन्न स्थानों में विभिन्न स्वरूप लिए विकसित पाई जाती है । इस तन्त्र में जीवन मण्डल में चलने वाली सभी प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं तथा मानव इसके एक घटक के रूप में कभी उसमें परिवर्तक अथवा बाधक के रूप में कार्य करता है।

पारिस्थितिकतन्त्र को स्पष्ट करते हुए माँकहॉउस तथा स्माल ने लिखा हैपादप तथा जीव जन्तुओं अथवा जैविक समुदाय का प्राकृतिक पर्यावरण तथा आवास के दृष्टिकोण से अध्ययन करना । जैविक समुदाय में वनस्पति तथा जीव जन्तुओं के साथ ही मानव भी शामिल किया जाता है। इसी तरह के विचार पीटर हेगेट ने पारिस्थितिकतन्त्र को परिभाषित करते हुए लिखा है– “पारिस्थितिकतन्त्र वह पारिस्थितिक व्यवस्था है जिसमें पादप तथा जीवजन्तु अपने पर्यावरण से पोषक चेन द्वारा संयुक्त रहते हैं।'

अभिप्राय यह है कि पर्यावरण पारिस्थितिकतन्त्र को नियन्त्रित करता है तथा हर व्यवस्था में विशिष्ट वनस्पति और जीवप्रजातियों का विकास होता है । पर्यावरण वनस्पति तथा जीवों के अस्तित्व का आधार होता है एवं इनका अस्तित्व उस व्यवस्था पर निर्भर करता है जो इन्हें पोषण प्रदान करती है ।

स्थेलर ने पारिस्थितिकतन्त्र की व्याख्या करते हुए लिखा है– "पारिस्थितिकतन्त्र उन सभी घटकों का समूह है जो जीवों के एक समूह की क्रियाप्रतिक्रिया में योग देते हैं।" वे आगे लिखते हैं भूगोलवेत्ताओं हेतु पारिस्थितिकतन्त्र उन भौतिक दशाओं के संगठन का भाग है जो जीवन सतह (स्तर) का निर्माण करते हैं।"

मूलतः पारिस्थितिकतन्त्र एक विशिष्ट पर्यावरण व्यवस्था है जिसमे पर्यावरण के विभिन्न घटकों में एक सन्तुलन होता है जो विशिष्ट जीवन समूहों के विकास का कारक होता है|

पारिस्थितिकतन्त्र के सभी पक्षों को एनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटानिका में इस तरह व्यक्त किया गया है– “पारिस्थितिकतन्त्र एक क्षेत्र विशेष की वह इकाई है जिसमें पर्यावरण से प्रतिक्रिया करते हुए सभी जीवन शामिल होते हैं। इनमें ऊर्जा प्रवाह के माध्यम से पोषण उपलब्ध होता है, फलस्वरूप जैव विविधता तथा विभिन्न भौतिक चक्रों का प्रादुर्भाव होता है। यह सभी क्रम एक नियन्त्रित स्वरूप में कार्यरत रहता है।"

उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट होता है कि पारिस्थितिकतन्त्र एक क्षेत्र विशेष में विकसित एक इकाई है जिसमें विभिन्न जीवों का समूह विकसित होता है। इसमें विभिन्न तरह के पादप, वनस्पति, जल, जीव, स्थलीय जीव शामिल होते हैं। ये जीव प्राथमिक उत्पादक, द्वितीय उत्पादक अथवा उपभोक्ता तथा अपघटक के रूप में होते हैं। इन पर अजैविक घटकों का नियन्त्रण होता है जिनमें अकार्बनिक तत्व जैसे ऑक्सीजन, कार्बन डाईऑक्साइड, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, खनिज लवण, अकार्बनिक पदार्थ जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, आदि एवं जलवायु तत्व जल,प्रकाश, तापमान आदि शामिल होते हैं। सम्पूर्ण भौतिक तत्वों से मिलकर ही पर्यावरण बनता है । इन सभी घटकों तथा तत्वों में ऊर्जा प्रवाह हमेशा रहता है जो पारिस्थितिकतन्त्र को सुचारु रूप से गतिमय रहने हेतु जरूरी है। पारिस्थितिकतन्त्र में पदार्थों का चक्रीकरण हमेशा होता रहता है, इससे पोषण तन्त्र अनवरत रहता है जैसे कार्बन चक्र, नाइट्रोजन, चक्र, हाइड्रोजन चक्र, ऑक्सीजन चक्र, फास्फोरस चक्र आदि । स्पष्ट है कि पारिस्थितिकतन्त्र एक अनवरत प्रक्रिया है पर अगर इसके किसी एक घटक में परिवर्तन आता है या ऊर्जा प्रवाह में बाधा होती है अथवा चक्रीकरण में व्यवधान आता है तो पारिस्थितिकतन्त्र में असन्तुलन पैदा हो जाता है जो जीव अस्तित्व हेतु संकट का कारण बन जाता है।

उपर्युक्त सभी विचारों तथा अन्य विद्वानों द्वारा इस संबंध में की गई टिप्पणियों का सार यह है कि पारिस्थितिकतन्त्र एक क्षेत्र विशेष के पर्यावरण और उसमें उद्भूत जीवन तन्त्र के अन्तर्सम्बन्धों की उपज है। इसमें स्थान तथा समय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जो मुख्य भौगोलिक उपादान है । वास्तव में पारिस्थितिकतन्त्र क्षेत्रीय तथा वृहत भौगोलिक अन्तर्सम्बन्धों का परिणाम है।

पारिस्थितिकतन्त्र के घटक

हर पारिस्थितिकतन्त्र की संरचना दो तरह के घटकों से होती है -

(अ) जैविक अथवा जीवीय घटक
(ब) अजैविक अथवा अजीवीय घटक
(अ) जीवीय घटकजैविक अथवा जीवीय घटकों को दो भागों में विभक्त किया जाता है

(i) स्वपोषित घटक

वे सभी जीव इसे बनाते हैं जो साधारण अकार्बनिक पदार्थों को प्राप्त कर जटिल पदार्थों का संश्लेषण कर लेते हैं अर्थात अपने पोषण हेतु खुद भोजन का निर्माण अकार्बनिक पदार्थों से करते हैं। ये सूर्य से ऊर्जा प्राप्त कर प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा अकार्बनिक पदार्थों, जल तथा कार्बनडाईऑक्साइड को प्रयोग में लाकर भोजन बनाते हैं जिनका उदाहरण हरे पौधे हैं। ये घटक उत्पादक कहलाते हैं।

(ii) परपोषित अश

ये स्वपोषित अंश द्वारा उत्पन्न किया हुआ भोजन दूसरे जीव द्वारा प्रयोग में लिया जाता है। ये जीव उपभोक्ता अथवा अपघटनकर्ता कहलाते हैं।

कायात्मक दृष्टिकोण से जीवीय घटकों का क्रमश उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक श्रेणियों में विभक्त किया जाता है

1. उत्पादकइसमें जो स्वयं अपना भोजन बनाते हैं जैसे हरे पौधे,वे प्राथमिक उत्पादक होते हैं तथा इन पर निर्भर जीवजन्तु और मनुष्य गौण उत्पादक होते हैं क्योंकि वे पौधों से भोजन लेकर उनसे प्रोटीन, वसा आदि का निर्माण करते हैं।

2. उपभोक्ताये तीन तरह के होते हैं

(i) प्राथमिकजो पेड़, पौधों की हरी पत्तियाँ भोजन के रूप में काम लेते हैं जैसे गाय, बकरी, मनुष्य आदि । इन्हें शाकाहारी कहते हैं।

(ii) गौण अथवा द्वितीयजो शाकाहारी जन्तुओं अथवा प्राथमिक उपभोक्ताओं को भोजन के रूप में करते हैं जैसे शेर, चीता, मेढ़क, मनुष्य आदि। इन्हें मांसाहारी कहते हैं।

(iii) तृतीयइस श्रेणी में वे आते हैं जो मांसाहारी को खा जाते हैं जैसे साँप मेंढक को खा जाता है, मोर साँप को खा जाता है।

3. अपघटकइसमें प्रमुख रूप से जीवाणु एवं कवकों का समावेश होता है जो मरे हुए उपभोक्ताओं को साधारण भौतिक तत्वों मे विघटित कर देते हैं एवं फिर से वायु मण्डल में मिल जाते हैं।

(ब) अजैविक अथवा अजीवीय घटकइनको तीन भागों में बाँटा जाता है

(i) जलवायु तत्वजैसे सूर्य का प्रकाश, तापक्रम, वर्षा आदि।

(ii) कार्बनिक पदार्थजैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, आदि।

(iii) अकार्बनिक पदार्थजैसे कैल्शियम, कार्बन, हाइड्रोजन, सल्फर,नाइट्रोजन आदि।

पारिस्थितिकतन्त्र का कार्यात्मक स्वरूपपारिस्थितिकतन्त्र हमेशा क्रियाशील रहता है, उसी को इसके कार्यात्मक स्वरूप की संज्ञा दी जाती है। कार्यात्मक स्वरूप के अन्तर्गत ऊर्जा प्रवाह, पोषकता का प्रवाह तथा जैविक एवं पर्यावरणीय नियमन शामिल होता है, जो सामूहिक रूप में हर तन्त्र को परिचालित करता है । यह सम्पूर्ण क्रिया एक चक्र के रूप में चलती है जिसे जैवभूरासायनिक चक्र के नाम से पुकारा जाता है।

जैवभूरासायनिक चक्र में ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत सूर्य होता है जो जलवायु व्यवस्था के अनुरूप ऊर्जा प्रदान करता है। उत्पादक प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से खनिज लवण, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन द्वारा शाकाहारी जीवों को भोजन प्रदान करते हैं जिन पर मांसाहारी निर्भर करते हैं। इन्हीं के अपघटन के कारण विभिन्न खनिज लवण भी बनते हैं जो पुनः उत्पादक तक पहुंचते हैं। ऊर्जा सूर्य से उत्पादक, फिर भोज्य एवं अपघटक में पहुंचती है। ये सभी क्रियाएँ नियमित तथा इतनी ज्यादा सुचारु रूप से सम्पादित होती हैं कि प्रायः आभास नहीं होता। इस सम्पूर्ण क्रिया में ऊर्जा का प्रवेश एवं उसका रूपान्तरण गणित के उष्मागतित नियम के अनुसार होता है अर्थात ऊर्जा का न तो निर्माण होता है न उसका नाश वरन उसका रूपान्तरण होता है, इस क्रम में कुछ ऊर्जा नष्ट भी होती है।

ऊर्जा प्रवाहपारिस्थितिकतन्त्र का नियन्त्रक है, हर जीव को विभिन्न क्रियायों को सम्पादित करने के लिए ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती है। सूर्य से प्राप्त ऊर्जा जिसे सौर्य ताप कहते हैं,सम्पूर्ण पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाती वरन इसका विविध तरह से अवशोषण, विकिरण, परावर्तन आदि हो जाता है। सौर्य ताप के एक अंश को वायु मण्डल की कई गैसें, धूल के कण, जल वाष्प एवं अन्य अशुद्धियाँ शोषण कर लेती हैं। इसमें ओजोन तथा कार्बनडाईऑक्साइड गैस इसे ज्यादा प्रभावित करती है। कुछ ऊर्जा प्रकीर्णन द्वारा फैल जाती है, कुछ बादलों तथा अन्य गैसों से परावर्तित हो जाती है एवं कुछ भाग अवशोषण द्वारा खत्म हो जाता है। इस तरह सौर ऊर्जा का मात्र 14% भाग वायु मण्डल में सीधे प्राप्त होता है एवं 34 प्रतिशत पृथ्वी की विकिरण क्रिया से मिलता है। इस तरह वायु मण्डल में जितनी उष्मा आती है उतनी ही पुनः लौट जाती है या प्रयोग में ले ली जाती है। इस तरह ऊर्जा प्रवाह क्रम चलता रहता है।

अगर किसी कारण सौर ऊर्जा चक्र में बाधा आ जावे तथा ज्यादा मात्रा में उष्मा का प्रवाह होने लगे तो पृथ्वी पर कई जलवायु तथा पारिस्थितिक परिवर्तन हो जायेंगे। ओजोन गैस की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण है, ये पृथ्वी पर कवच का कार्य करती है एवं हानिकारक पैरा बैंगनी किरणों को आने से रोकती है। पर प्रदूषण में वृद्धि विशेषकर क्लोरोफ्लोरो कार्बन से ओजोन परत में छिद्र होने की सम्भावना व्यक्त की जाती है जो जीवजन्तु हेतु संकटप्रद होती है।

वनस्पति तथा जीवों में ऊर्जा का रूपान्तरण, विविध तरह से होता है, जो भोजन क्रम को संचालित करता है । यह तथ्य सर्वप्रथम पारिस्थितिक विद्वान लिण्डमेन ने 1942 में प्रतिपादित किया। उनके अनुसार सम्पूर्ण पारिस्थितिकचक्र को ऊर्जा प्रवाह के दो तथ्यों अर्थात ऊर्जा भण्डार का स्तर तथा उसके स्थानान्तरण की क्षमता द्वारा समझा जा सकता है । इसके बाद अनेक विद्वानों जैसे एचड़ी. ओडम,स्लोबोडकिन, तील, कोजलोवस्की आदि ने इस पर विचार रखे । सूर्य प्रकाश से जो 3000 किलो कैलोरी ऊर्जा किरणों से प्राप्त होती है उसका करीब आधा भाग (1500 किलो कैलोरी) ही पौधों द्वारा ग्रहण होता है एवं उसका एक प्रतिशत प्रथम पोषण पर पौधों द्वारा रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तन होता है | यह मात्रा द्वितीय तथा तृतीय स्तर पर घटती जाती है। प्रायः जब एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर में ऊर्जा जाती है तो उसका ज्यादातर भाग नष्ट होता है। अतः भोजन चक्र जितना छोटा होगा उतनी ही ज्यादा ऊर्जा प्राप्त होगी।

पारिस्थितिकतन्त्र की उत्पादकता

इससे अभिप्राय है पोषण स्तर प्रथम में स्वपोषित पौधों द्वारा ऊर्जा उपयोग से पोषण प्राप्त करना । दूसरे शब्दों में यह परावर्तित ऊर्जा फोटोसिन्थेसिस क्रिया से एवं अन्य रासायनिक क्रिया से संचित कर उत्पादकता के रूप में उपयोग में ली जाती है। इस उत्पादकता के निम्न चार क्रमिक सोपान होते हैं

1. सकल प्राथमिक उत्पादकता
2. वास्तविक प्राथमिक उत्पादकता
3. सामुदायिक उत्पादकता
4. गौण उत्पादकता

सकल प्राथमिक उत्पादकता से अभिप्राय है पोषण स्तर एक में स्वपोषित पौधों द्वारा उत्पादित रासायनिक ऊर्जा की मात्रा अर्थात यह फोटोसिन्थेसिस की कुल दर है जिसमें श्वसन में प्रयुक्त जैविक पदार्थ भी शामिल हैं। वास्तविक प्राथमिक उत्पादकता से तात्पर्य पोषण स्तर एक में संचित अथवा स्थिरीकृत ऊर्जा या जैविक पदार्थों की मात्रा से होता है। जबकि सामुदायिक उत्पादकता से अभिप्राय जैविक पदार्थों के संचित करने की दर से है । इससे भिन्न उपभोक्ता स्तर पर ऊर्जा संचय की दर को गौण उत्पादकता के नाम से पुकारा जाता है।

ई.पी. ओडम ने विश्व स्तर पर प्राथमिक उत्पादकता के तीन स्तर क्रमश: उच्च उत्पादकता,मध्यम उत्पादकता तथा निम्न उत्पादकता के रूप में निर्धारित किये हैं । उच्च उत्पादकता प्रदेशों में उष्ण तथा शीतोष्ण आर्द्र वन, जलोढ़ मैदान, गहरी कृषि और छिछले जलीय क्षेत्रों को शामिल किया है वहीं मध्यम उत्पादकता क्षेत्रों में घास के मैदान, छिछली झीलें एवं विस्तृत कृषि क्षेत्र शामिल हैं। तृतीय अर्थात निम्न पारिस्थितिकी उत्पादकता के प्रदेश में हिमाच्छादित क्षेत्र, मरुस्थली, प्रदेश एवं अगाध सागरीय क्षेत्रों को शामिल किया जाता है। वास्तव में पारिस्थितिकतन्त्र का कार्यसम्पादन ऊर्जा प्रवाह तथा उत्पादकता के सम्मिलित प्रक्रम द्वारा सम्पन्न होता है।

पारिस्थितिकीतन्त्र के प्रकार

प्रकृति में विभिन्न तरह के पारिस्थितिक्तन्त्र कार्यरत रहते हैं । ये तन्त्र जलवायु, मृदा, वनस्पति,जल,स्थल के साथसाथ भिन्नता रखते हैं, इसके अलावा मानव ने पर्यावरण का उपयोग कर नवीन पारिस्थितिकतन्त्रों का विकास किया है। इसी तरह पारिस्थितिकतन्त्र के फैलाव की कोई सीमा नहीं है ।

            सम्पूर्ण पृथ्वी एक पारिस्थितिकतन्त्र है जिसे जीव मण्डल की संज्ञा दी जाती है, इसके कई वृहत खण्ड हैं जिन्हें जैव खण्ड कहा जाता है। हर खण्ड के गौण तथा उप खण्ड हैं । तात्पर्य यह है कि पारिस्थितिकतन्त्र का विस्तार वृहत प्रदेशों में भी हो सकता है, तथा सूक्ष्म प्रदेशों में भी।

पारिस्थितिकतन्त्रों के सामान्य प्रकार निम्न हैं

I. प्राकृतिक पारिस्थितिक तन्त्र जो प्राकृतिक रूप में मानव के प्रभाव के बिना कार्यरत रहते हैं।

1. स्थलीय पारिस्थितिकतन्त्रजैसे वानिकी, घास क्षेत्र, मरुस्थल आदि ।

2. जलीय पारिस्थितिकतन्त्रइसके दो प्रकार हैं


(i)
शुद्ध जलीय इसमें बहता पानी जैसे नदी, झरना तथा स्थिर जल जैसे झील, तालाब, दलदल आदि ।

(ii) सागरीयइसमें गहरा सांगरीय तथा तटीय अथवा उथला सागरीय।

 II. अप्राकृतिक अथवा मानवकृत पारिस्थितिकतन्त्र

इसमें मानव अपने बौद्धिक, तकनीकी तथा वैज्ञानिक स्तर के अनुरूप पर्यावरण का उपयोग कर पारिस्थितिकतन्त्र विकसित करते हैं, जैसेकृषि क्षेत्र अथवा फसल पारिस्थितिकतन्त्र, चारागाह, नगरीय, यहाँ तक कि आकाशीय पारिस्थितिकतन्त्र का विकास करता है।

भौगोलिक दृष्टिकोण से पीटर हेगेट ने अपनी पुस्तक 'Geography– A Modern Synthesis' में नौ वृहत् पारिस्थितिक तथा पर्यावरण प्रदेशों का वर्णन किया है । ये हैं

1. विषुवत् रेखीय
2.
मध्य अक्षांशी सीमावर्ती
3.
बोरेल
4.
सवाना
5.
भूमध्यसागरीय
6.
मध्य अक्षांशीय चरागाह
7.
शुष्क तथा अर्द्ध शुष्क
8.
टुण्ड्रा
9.
ध्रुवीय

उपर्युक्त प्रकारों के अलावा भी पारिस्थितिकतन्त्र के कई क्षेत्रीय तथा सूक्ष्म प्रकार सम्भव हैं। पारिस्थितिकतन्त्र के प्रकारों के अध्ययन का आवासीय दृष्टिकोण' उत्तम विधि है, यह भौगोलिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पर्यावरण का जीवों/मानव के साथ सामन्जस्य स्थापित कर अध्ययन किया जाता है। जिस तरह का पर्यावरण होगा वैसी ही वनस्पति, जीवजन्तु, मानव क्रियाएँ होंगी । भौगोलिक दृष्टिकोण से हेगेट द्वारा किया गया वर्गीकरण ज्यादा प्रासंगिक है।

शुद्ध जल पारिस्थितिकतन्त्रमें जल के सभी तथ्यों अर्थात प्राकृतिक, रासायनिक, भूगर्भिक तथा जैविक का अध्ययन होता है । यह जल ठहरा अथवा स्थिर तथा बहता हुआ हो सकता है । शुद्ध जल पारिस्थितिकी को परिभाषित करते हुए ओडम ने लिखा है– “Fresh water ecology emphasizes the organisms environment relationship in the fresh water habitat in the context of the ecosystem principle." तात्पये यह है कि जल में उसकी संरचना के अनुरूप विभिन्न तरह के उत्पादक या जीवों का उदभव होता है, वे सभी से अथवा एकदूसरे से भोजन प्राप्त कर अस्तित्व में आते हैं तथा अन्त में अपघटित हो जाते है।

सागरीय पारिस्थितिकतन्त्रपृथ्वी तल का करीब 70 प्रतिशत भाग महासागरीय है एवं हर महासागर का एक वृहत पारिस्थितिकतन्त्र होता है। सागरीय जल का रासायनिक प्रक्रम भिन्न होता है अत: उसमें तापमान तथा ऑक्सीजन आदि की प्रक्रिया भी भिन्नता से चलती है । इन सभी तथ्यों का अध्ययन समुद्र विज्ञान में किया जाता है, जबकि सागरीय अथवा सामुद्रिक पारिस्थितिकी से अभिप्राय है (ओडम के शब्दों में) “Marine ecology emphasizes the totality or pattern of relationships between organism and the sea environemtn. इसमें गहरे सागर की पारिस्थितिकी, उथले सागर अथवा तटीय क्षत्र स भिन्न होती है। इसी का मुख्य भाग 'एस्चुरी पारिस्थितिकी होता है । सागरीय पारिस्थितिकतन्त्र जल की संरचना तथा उसमें रहने वाले जीवजन्तुओं, वनस्पति की पर्यावरण के समानुकूलन का तन्त्र है। इसका अध्ययन समुद्र विज्ञान, जन्तु विज्ञान, वनस्पति विज्ञान हेतु अत्यधिक जरूरी है ।

घास के मैदानों का पारिस्थितिकुतन्त्र यह स्थलीय पारिस्थितिकतन्त्र है । पृथ्वी पर करीब 19 प्रतिशत क्षेत्र पर घास के मैदान हैं । इसमें उष्ण कटिबन्धीय तथा शीतोषण कटिबन्धीय घास के मैदान शामिल हैं। इसमेंसवाना' घास पारिस्थितिकतन्त्र महत्वपूर्ण है। इस तन्त्र में वायु तथा मृदा में उपस्थित विभिन्न रासायनिक तत्वों के प्रभाव से विभिन्न तरह की घास, झाड़ियाँ तथा पौधों का विकास होता है। इनके प्राथमिक उपभोक्ताओं में घास खाने वाले जानवर एवं घास की पत्तियाँ खाने वाले कई तरह के कीट आते हैं । द्वितीय उपभोक्ताओं में माँसाहारी जीवजन्तु आते हैं। मानव स्वयं भी पशुओं से प्राप्त पदार्थों का उपयोग करता है एवं शिकार भी करता है। अपघटक के रूप में मृत जीवजन्तु, उनके द्वारा उत्सर्जित पदार्थ से कई जीवाणुओं का जन्म हो जाता है जो अन्त में मृदा में मिल जाते हैं । इन प्रदेशों में पशु चारण स्वतन्त्र तथा व्यापारिक प्रमुखता से होता है, पर जहाँ परिस्थितियाँ अनुकूल हैं वहाँ कृषि की जाने लगी है एवं मानव ने अन्य धार्मिक क्रियाओं का भी विकास किया है।

वनीय पारिस्थितिकतन्त्रपृथ्वी के विस्तृत क्षेत्रों में वनों का विस्तार है। एक तरफ सदाबहार उष्ण कटिबन्धीय वन हैं तो दूसरी तरफ शीतोष्ण के पतझड़ वाले एवं शीतशीतोष्ण के सीमावर्ती प्रदेशों के कोणधारी वन हैं। वन अथवा प्राकृतिक वनस्पति जहाँ एक तरफ पर्यावरण/पारिस्थितिकी के विभिन्न तत्वों जैसे तापमान, वर्षा, आर्द्रता, मृदा आदि को नियन्त्रित करते हैं वहीं उनका अपना पारिस्थितिकतन्त्र भी होता है ।

वनीय क्षेत्रों की मृदा में मिश्रित कई खनिज लवण तथा वायु मण्डल के तत्व इस प्रदेश के अजैविक तत्व होते हैं। दूसरी तरफ जैविक तत्वों में उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक के रूप में विभिन्न पादप और जीव शामिल होते हैं । उत्पादक के रूप में वनीय प्रदेशों में विभिन्न तरफ के वृक्ष होते हैं जो उष्ण, शीतोष्ण तथा शीत दशाओं के साथसाथ परिवर्तित होते हैं। इन्हीं के साथ विषुवतरेखीय प्रदेशों में झॉड़ियाँ, लतायें आदि की प्रधानता होती है। प्राथमिक उपभोक्ताओं में विभिन्न तरह के जानवर जो वनस्पति का प्रयोग करते हैं, कीट, वक्षों पर रहने वाले परिन्दे, द्वितीय उपभोक्ता में मांसाहारी जीवजन्तु, पक्षी शामिल हैं। मानव भी एक हद तक भक्षक का कार्य करता है । वनस्पति लगातार गिर कर सड़ती रहती है एवं मृदा में समाहित की जाती है. इस तरह जीवजन्तु भी मृत्यु के पश्चात जीवाणुओं द्वारा सड़ते हैं तथा अन्त में मिट्टी में मिल जाते हैं। विश्व के उष्ण कटिबन्धीय वनों की तरफ वर्तमान में पर्याप्त ध्यान आकृष्ट है क्योंकि इनका तीव्रगति से हो रहा विनाश विश्व पारिस्थितिकतन्त्र के लिये खतरा है।

मरुस्थली पारिस्थितिकतन्त्र पृथ्वीतल के करीब 17 प्रतिशत भाग पर उष्ण मरुस्थल हैं । यहाँ का पर्यावरण अल्प वर्षा तथा उच्च तापमान के कारण विशिष्ट होता है । जल की कमी के कारण यहाँ की वनस्पति भी विशिष्ट होती है एवं शुष्कता से बालूका स्तूपों का सर्वत्र विस्तार होता है । मरुस्थल क्षेत्र की प्राकृतिक वनस्पति कंटीली झाड़ियाँ, छोटी घास तथा कुछ शुष्कता सहन करने वाले वृछ होते हैं । इन क्षेत्रों में रेंगने वाले तथा अन्य जीवों के साथ ऊँट, भेड़, बकरी की प्रधानता होती है जो कम वर्षा तथा अल्प भोजन पर जीवन व्यतीत कर लेते हैं। इन क्षेत्रों में अपघटक क्रिया अपेक्षाकृत कम होती है। इन प्रदेशों में पशुपालन के साथ जहाँ जल उपलब्ध हो जाता है, मोटे अनाज की की खेजी भी की जाती है। एक सामान्य तथ्य मरुस्थलों के संबंध में यह है कि यहाँ अगर जल उपलब्ध हो तो वे उत्तम कृषि क्षेत्र बन जाते हैं जैसा कि नील नदी की घाटी में, थार के इन्दिरा गाँधी नहर क्षेत्र में, आदि । इन प्रदेशों के पारिस्थितिकतन्त्र में फिर परिवर्तन आ जाता है।

कृषि क्षेत्र पारिस्थितिकतन्त्र उपर्युक्त वर्णित पारिस्थितिकतन्त्र जहाँ एक तरफ पूर्णतया प्राकृतिक है वहीं मानव के तकनीकी तथा वैज्ञानिक ज्ञान के कारण प्राकृतिक पर्यावरण के साथ सामन्जस्य स्थापित कर मानव कृत तन्त्र का विकास होता है, इसी में एक मुख्य है कृषि क्षेत्र का पारिस्थितिकतन्त्र । इसमें मानव अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए रासायनिक तत्वों में परिवर्तन करता है, मृदा में कृत्रिम उर्वरक देकर खनिज लवणों की पूर्ति करता है, विशिष्ट तरह के बीज, सिंचाई व्यवस्था तथा तकनीकी प्रयोग से न सिर्फ कृषि क्षेत्र में विस्तार करता है वरन उत्पादन में वृद्धि, उत्तमता में विकास, नवीन फसलों के उत्पादन द्वारा अधिकतम विकास करता है|

कृषि क्षेत्र के पारिस्थितिकतन्त्र में मृदा तथा उसकी रासायनिक संरचना का बहुत महत्व होता है, क्योंकि उसी के अनुरूप कृषि उपजों का निर्धारण किया जाता है । इन फसलों के साथ कई तरह के पौधे स्वत: उगते रहते हैं। उपभोक्ता में विभिन्न कीट,जीवजन्तु, पक्षी, पालतू जानवर तथा स्वयं मानव होते हैं। कुछ पत्ते तथा फल खाते हैं तो अन्य अनाज का उपभोग करते हैं। फसलों के पक जाने के बाद विभिन्न कार्बनिक पदार्थ मृदा में मिश्रित हो जाते हैं।

उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि प्राकृतिक पर्यावरण में परिवर्तन के साथसाथ पारिस्थितिकतन्त्र में परिवर्तन आता है, मानवीय प्रयास उसमें और ज्यादा समानुकूलन पैदा करते हैं तथा कई नवीन पारिस्थितिकतन्त्र का विकास हो जाता है । विश्वव्यापी पारिस्थितिकतन्त्र के अलावा मध्यम श्रेणी के तत्वों का विकास एक देश अथवा प्रदेश में हो जाता है। उदाहरणार्थ भारत में निम्न पारिस्थितिकप्रदेश स्पष्ट दृष्टिगत होते हैं

1. हिमालय पर्वतीय पारिस्थितिकतन्त्र,
2.
मैदानी पारिस्थितिकी,
3.
मरुस्थली प्रदेश पारिस्थितिकी,
4.
मध्य भारत पठार प्रदेश,
5.
प्रायद्वीपीय पठारी प्रदेश,
6.
तटवर्ती मैदानी पारिस्थितिकी तथा
7.
समुद्र द्वीपीय पारिस्थितिकी ।

उपर्युक्त वर्गीकरण मूलरूप से धरातलीय दशाओं के आधार पर है, जिसके कारण जलवायु, वनस्पति, मृदा तथा मानवीय समानुकूलन में अन्तर आ जाता है। हर मध्यम श्रेणी के पारिस्थितिकीप्रदेश के कई उपविभाग तथा सूक्ष्म पारिस्थितिक क्षेत्र होते हैं, जिनका विकास पर्यावरणमानव सामन्जस्य का परिणाम होता है। जैसे राजस्थान राज्य में चार प्रमुख पारिस्थितिकतन्त्रों का विकास हुआ है, ये हैं

1.         मरुस्थली  पारिस्थितिकतन्त्र
2.        
अरावली पर्वतीयपारिस्थितिकतन्त्र
3.        
पूर्वीमैदानी पारिस्थितिकतन्त्र
4.        
हाड़ोती  पारिस्थितिकतन्त्र

ये सभी प्रदेश प्राकृतिक दृष्टि से भिन्न हैं तथा इनका प्रभाव आर्थिक तन्त्र पर स्पष्ट है। इन प्रदेशों के भी पुनः सूक्ष्म विभाग स्थानीय दशाओं के आधार पर सम्भव होते हैं, जैसे मरुस्थली प्रदेश में शुष्क मरुस्थल, अर्द्ध शुष्क मरुस्थल, सिंचित मरुस्थल, आदि; हाड़ौती प्रदेश में चम्बल क्षेत्र, मुकन्दरा क्षेत्र, शाहबाद का वनीय क्षेत्र, बूंदी की पहाड़ियाँ, काली सिंध का मैदान, झालावाड़ का पठार आदि ।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि पारिस्थितिकतन्त्र का विकास पर्यावरण तथा मानव के सामन्जस्य और समानुकूलन का परिणाम है। ये प्रदेश विकास या क्षेत्रीय विकास का आधार पेश करते हैं। अगर विकास योजनाओं का प्रारूप पारिस्थितिकतन्त्र/प्रदेशों के आधार पर किया जाय तो वे विकास को नई दिशा प्रदान करेंगी तथा उससे क्षेत्रीय समस्याओं का निराकरण होगा एवं वास्तविक विकास सम्भव होगा।

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