मानव मूल्य (Human Values)
‘मूल्य’ अंग्रेजी शब्द ‘Value’ का हिन्दी रूपान्तरण है। यह शब्द लैटिन भाषा के शब्द ‘Valere’ (वैलियर) से बना है। जिसका अर्थ है- योग्यता, उपयोगिता, कीमत, उत्तमता, महत्त्व आदि जिसके द्वारा कोई वस्तु लाभदायक या सम्मान योग्य बनती है। मूल्य शब्द का कोशीय अर्थ है- व्यक्ति या किसी वस्तु का ऐसा गुण जिसके कारण वह महत्त्वपूर्ण, सम्माननीन एवं उपयोगी सिद्ध हो जाए। यह गुण आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार का होता है। इसके अतिरिक्त मूल्य शब्द का दार्शनिक एवं शैक्षिक अर्थ भी है। दर्शनशास्त्र में मूल्य एक शुद्ध सूक्ष्म तत्त्व है।
नैतिक मूल्यों का संबंध ‘स्व’ से है। यहां ‘स्व’ का अर्थ बद्धि तथा भावना से है जो सयुक्त रूप से आत्मा के अर्थ मे समझा जाता है। यह व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक का कार्य करता है। चूंकि नैतिक मूल्यों की संख्या एक से अधिक है अतः इन्हें समग्र रूप से मुल्य व्यवस्था (मूल्यतंत्र) क रूप में समझा जा सकता है। मूल्य-तंत्र अथवा मल्यों की व्यवस्था एक स्थायी संगठन के समान होती है जो मानव अस्तित्व के विभिन्न स्तरों या आयामों के साथ व्यक्ति के अनुकूलन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण प्रोत्साहन उनका मार्गदर्शन भी करती है। मल्यों की इस व्यवस्था में किसी दो मूल्यों की महत्ता के बीच सापेक्ष संबंध होता है उदाहरणस्वरूप ‘ईमानदारी’ एक व्यक्ति के लिए ‘सफलता’ के मुकाबले के बीच सापेक्ष संबंध होता है। उदाहरणस्वरूप ‘ईमानदारी’ एक व्यक्ति का अधिक वांछनीय हो सकती है क्योंकि उसकी नजर में ईमानदारी सफलता सा अन्य व्यक्ति इसके ठीक विपरीत भी सोच सकता है। मानव मूल्य की परिभाषाएँ -
राधाकमल मुखर्जी के शब्दों में- “समाज की समस्त ऐसी इच्छाएँ या अभिलाषाएँ मूल्य कही जाती हैं जो कि अनुबन्धन की प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति में अन्तर्निहित हो जाती हैं, जो कि समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा भी उस व्यक्ति की प्राथमिकताओं, रुचियों, महत्त्वाकांक्षाओं के रूप में प्रकट होती है।”
क्लूकान के अनुसार, “मूल्य प्रेरणाओं के विशिष्ट पहलू हैं, जो कि मानकीकृत संस्कृति की झलक देते हैं। ये एकाएक किसी परिस्थिति आवश्यकताओं की संतुष्टि के आधार पर प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं। मूल्य हमेशा शाब्दिक एवं प्रेरक व्यवहारों में दृष्टिगोचर होते हैं तथा व्यक्ति को क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए का ज्ञान कराते हैं।”
न्यासी के अनुसार- “किसी व्यक्ति के लिए वे रुचिकर वस्तुएँ मूल्य कही जा सकती हैं, जिनके आधार पर व्यक्ति की रुचि एवं वस्तु में एक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।”
फ्लिन्क के अनुसार- “मूल्य नियामक मापदण्ड है जिनके आधार पर व्यक्तियों की चुनाव प्रक्रिया प्रभावित होती हैं तथा अपने प्रत्यक्षीकरण के अनुरूप विभिन्न क्रियाओं का चुनाव करते हैं।”
ननली के शब्दों में- “जीवन के लक्ष्यों एवं जीवन प्रक्रिया के प्रति प्राथमिकता रखते हैं बजाए किसी विशिष्ट कार्य के प्रति रुचि रखने के।”
मानवीय मूल्य समाज द्वारा मान्यता प्राप्त इच्छाएं एवं लक्ष्य हैं जिन्हें मानव समाजी के माध्यम से सीखता है और जो व्यक्तिनिष्ठ अभिलाषाएं बन जाती है। निर्णय मानवीय मल्यों के भी हो सकते हैं या फिर निर्णय की प्रक्रिया में इनकी अनदेखी भी की जाती है। परन्त मानव के कारण के अन्तर्गत किए गए सारे महत्वपूर्ण निर्णयों, में इन मूल्यों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। दूसरे शब्दों में, मानवीय मूल्य ही निर्णयों के आवश्यक एवं अपरिहार्य तत्व है। मानवीय मूल्य ही वह कडी है जो व्यक्तिगत अनुभवों और निर्णयों, उद्देश्यों तथा कार्यों को जोड़ता है। सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन को समझने में भी मानवीय मूल्य इसी प्रकार की भूमिका का निर्वाह करते है। मूल्य व्यक्ति व समाज के व्यवहारों को नियंत्रित व सही मार्ग की ओर निर्देशित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह एक ओर मनुष्य के मानसिक तनावों व संघर्षों को सुलझाते हुए आंतरिक संगति व सम्बद्धता को उत्पन करता है एवं दूसरी ओर आदर्श आयाम की ओर वैयक्तिक व सामाजिक जीवन की उन्नति को निर्देशित करता है।
लगभग सभी समाजों में हिंसा, युद्ध, घृणा तथा अपराध का वर्चस्व दिखाई पड़ता है तथा इतिहा के विभिन्न युगों में भी यही प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है जिससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे मानवीय मूल्यों की सार्वभौमिकता जैसी कोई बात होती ही नहीं। परन्तु मानवीय मूल्यों की परंपरा आदि समाजों एवं धर्मों में भी देखी जा सकती है तथा मूल्यों की यह परंपरा तदन्तर आज भी जारी है जो सभी युगों एवं सभी संस्कृतियों में दृष्टिगोचर है। इस अर्थ में इन मूल्यों को सार्वभौम कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी।
मानवीय मूल्यों की अन्तर्वस्तु
मानवीय मूल्यों की अन्तर्वस्तु मानवीय मूल्यों को कई तरीके से प्रतिपादित अथवा अभिव्यक्त किया जा सकता है- अर्थात इन्हें व्यावहारिक उदाहरणों से लेकर उच्च नैतिक सिद्धान्तों के रूप में भी समझा जा सकता है। मानवीय मूल्य शिक्षाविदों अथवा उपदेशकों द्वारा विकसित किया गया कोई अमूर्त सिद्धान्त नहीं है अपित जीवन मे जडे विचार एवं नियम हैं जिनका औचित्य कई तरह से सिद्ध किया जा सकता है। चूकि मूल्यों का संबंध मानव से है अत: यह स्पष्ट है कि ये किसी आध्यात्मिक अथवा अतिप्राकृतिक सत्ता द्वारा निर्देशित आचरण के नियम भी नहीं हैं और न ही कोई ईश्वरीय आदेश। इनका संबंध विभिन्न संस्कृतियों विशिष्ट स्तियों तथा परिस्थितियों से है। इनका विकास ही मानव के लिए और मानवीय अर्थों में हुआ है जो मानवमात्र की आत्मसिद्धि में सहायक बने। समाज या संस्कृति मनुष्य को मूल्यों के आधारभत प्रतिमान समस्त मानवीय इच्छाएं सामाजिक आवेगा के साथ घुलो मिली रहती है। मानवीय मूल्य मनुष्य के सामाजिक संबंधों का घातक है। यह संस्कृति परंपरा व प्रशिक्षण ही मूल्य व्यवस्थाओं का सृजन करते हैं। मानवीय मूल्यों में वैयक्तिका को मिलता है। अपनी अभिरुचियों, आदतों तथा क्षमताओं में विविधता के अपने-अपने ढंग से करता है।
आधारभूत मानवीय मूल्य
यहाँ मानवीय मूल्यों की एक सूची प्रस्तुत की जा रही है जिसके प्रति आम लोग समान रूप से आस्था प्रकट करते हैं, अर्थात् इन मूल्यों को सार्वभौम व सर्वगतमूल्यों की कोटी मे रखा जा सकता है। ये हैं-
- सत्यता (सत्य)
- प्रेम और सेवा भावना
- शांति ।
- अहिंसा ।
- न्याय
सत्यता (सत्य)
किसी तथ्य की सत्यता किसी व्यक्ति विशेष की इच्छा या आकांक्षा पर निर्भर नहीं करती। सत्यता का अस्तित्व इच्छाओं, हितों एवं विचारों से स्वतंत्र होता है। यह सच है कि कोई भी झूठा व्यक्ति बल्कि अधिकांश झूठे लोग स्वयं को झूठा कहलवाना पसंद नहीं करते। इस बात को प्रमाणित करता है कि सत्य एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है तथा यह मानव मन में अन्तर्निहित होता है। सत्य से बौद्धिक संतष्टि मिलती है। केवल सत्य के अस्तित्व का ही नहीं, बल्कि सत्य के ज्ञान का भी साध्यमूल्य होता है। यह सर्वविदित है कि सत्य एक साध्यमूल्य है।
प्रेम और सेवा भावना
यहां ‘प्रेम’ शब्द का व्यापक अर्थ है। यहां ‘प्रेम’ से अभिप्राय है स्नेह रखना, ध्यान रखना तथा किसी की सुध लेना। मानव मूल्यों में यह बेहद मौलिक है जो दूसरों के प्रति आदर तथा सेवा भावना को व्यक्त करता है। प्रेम को व्यक्ति सामान्य तौर पर ‘व्यक्तिगत’ अर्थों में लेता है जिसमें काम विषयक भावना निहित होती है। परन्तु मानव मूल्य के अर्थ में प्रेम का सार एक पवित्र भावना को परिलक्षित करता है। यहां ‘प्रेम’ का अर्थ नि:स्वार्थ प्रेम है जो दसरों के प्रति तथा पूरे विश्व क प्रति समर्पित किया जा सकता हैप्रेम में स्वार्थ की भावना जितनी ही कम होगी जीवन की गुणवत्ता में उतनी ही अधिक व्रद्धि होगी यधपि प्रम’ शब्द स्वयं में अस्पष्ट एवं झूठ है परन्तु इसे परोपकारिता, क्षमा तथा सालमल क अर्थों में भी समझा जा सकता है। प्रेम की भावना अथवा संवेग के अर्थों में नही लिया जा सकता बल्कि इसे सिर्फ मानव चेतना के स्तर पर ही समझा जा सकता है। वस्तुतः यह मनुष्य की आत्मा की एक अदभुत विशिष्टता है और सार्वभौम सत्य भी।
शांति
शांति एक भावात्मक मूल्य है जो सार्वदेशिक और सार्वकालिक है। शांति का अर्थ है समरसता अथात् द्वेष और संघर्ष का अभाव। यह एक संतुलित परन्तु गत्यात्मक मानसिक स्थिति है। मानवीय मूल्यों – एक प्रकार्यात्मक संबंध होता है। अत: व्यक्ति अथवा समाज के नियंत्रण या अनुमोदन से समस्त मानवाय अभिप्रेरणाएं मूल्यों में रूपान्तरित हो जाती है। इनमें से सभी भावात्मक मानवीय मूल्यों केसम्मिलन से ही शांति की स्थापना संभव हो पाती है चाहे वह व्यक्तिगत जीवन में हो या फिर समाज या विश्व के स्तर पर। सत्य, न्याय और प्रेम, तथा भाईचारा शांति की स्थापना के लिए आवश्यक शर्ते है जिनके अभाव में हितों का संघर्ष शरू होता है तथा शांति खतरे में पड़ जाती है। हलांकि शांति को उपद्रव , हिंसा युद्ध तथा दुराचार के अभाव के रूप में भी समझा जा सकता है परन्तु इसके मूर्त रूपको समझना मुश्किल नहीं क्योंकि व्यक्ति इसे एक-दसरे के प्रति आदर. मित्रभाव, सहिष्णता और सक शाति के रूप में स्पष्ट रूप से महसूस करता है। मन की शांति भले ही एक व्यक्तिगत अनुभव परन्तु समाज के सदर्भ में शांति की स्थापना सकारात्मक कार्यों से ही संभव है। ये कार्य हिंसक या विध्वंसात्मक नहीं बल्कि रचनात्मक एवं सहिष्णुतापूर्ण होते हैं।
अहिंसा
मानवीय मूल्यों में अहिंसा का महत्वपूर्ण स्थान है। अहिंसा के बिना सर्वोच्च सत्य की सिद्धि असम्भव है। अहिंसा का अर्थ है हिंसा न करना अर्थात् यह एक मानवीय प्रवृत्ति है जिसमें व्यक्ति प्राणियों तथा उनके परिवेश को हर प्रकार की हानि से सुरक्षित रखने की चेष्टा करता है। स्वार्थ और द्वेष को त्यागकर क्रोध पर विजय प्राप्त करना तथा किसी को भी किसी प्रकार का दु:ख या कष्ट न पहुँचाना अहिंसा है। मूल्यात्मक अवधारणा होने के साथ-साथ अहिंसा एक व्यापक अवधारणा भी है। इस अर्थ में पर्यावरण तथा पारिस्थितिक तंत्र का शोषण तथा प्रदूषण आदि से रक्षा करना भी अहिंसा के अंतर्गत आता है। वस्तुत: इस कार्य से अहिंसा की भावना को बल मिलता है। यह एक ऐसी प्रवृत्ति है जो हमें अनैतिक कार्य करने तथा प्रकृति में असंतुलन पैदा करने जैसे कार्यों से रोकता है। हिन्दू धर्म तथा गांधी दर्शन में भी अहिंसा की व्याख्या इसी रूप में की गई है। वस्तुतः अहिंसा करना आदर्शवाद नहीं है। यह एक ऐसा मूल्य है जिसे सभी धारण कर सकते हैं। पशु भक्षण से खेती की ओर, लूटपाट से व्यवस्थित जीवन की ओर बढ़ना, व्यक्ति से परिवार की ओर, राष्ट्रीयता से अन्तरराष्ट्रीयता का विचार अहिंसा की व्यापकता के ही चिन्ह है। अत: अहिंसा के आधार पर ही आदर्श समाज का संगठन किया जा सकता है।
न्याय
यूरोपीय परम्परा के अन्तर्गत न्याय को उच्चतम मानवीय मूल्यों की कोटि में रखा गया है बल्कि सुकरात एवं प्लेटो ने तो इसे उच्चतम मानवीय मूल्य के रूप में स्वीकार किया है। ‘न्याय’ की संतोषजनक परिभाषा देना यद्यपि मुश्किल है परन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि न्याय आधार निष्पक्षता है जिसका मौलिक अर्थ यह है कि कानून के समक्ष सभी व्यक्ति समान है। न्याय एक सामाजिक मूल्य है जो अहिंसा व स्नेह के नियमों से संचालित होता है। न्याय का मूल उद्देश्य है संघर्षों को कम अथवा समाप्त करना। सार्वजनिक कल्याण हेत सामाजिक न्याय की परम्परा अत्यंत प्राचीन है जिसका उदाहरण हमें इतिहास-पूर्व काल में भी देखने को मिलता है। सभी समाजों में इसे एक केन्द्रीय विचार के रूप में अपनाया जाता रहा है। न्याय की संकल्पना प्राचीन यनान में चिंतन का मुख्य विषय रही है और इसी से बाद में मानवाधिकारों की संकल्पना का प्रादर्भाव हआ। तत्पश्चात दिसम्बर, 1948 में जेनेवा कवेशन के द्वारा मानवाधिकारों की विश्वजनीन घोषणा जारी की गई।
न्याय एक राजनीतिक मूल्य भी है और इस अर्थ में भी इसकी प्रासंगिकता व्यापक है क्योंकि राजनीति लोकतंत्र के साथ-साथ अन्य शासन प्रणालियों में भी राजनीतिक न्याय के आधार पर ही समतापूरक समाज और राष्ट्र की स्थापना की जा सकती है। मानवीय मूल्य होने के नाते न्याय की महत्ता इसी बात से स्पष्ट होती है कि यह सामाजिक जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित करता है। आज न्याय के संबंध में केवल ऐसी संकल्पना को स्वीकार किया जाता है जिसका निर्माण जीवन के सामाजिक, आथिक, राजनीतिक यथार्थ को सामने रखकर किया गया हो। न्याय के मल्य को वेदों में उल्लिखित अहिंसा के अर्थ में भी समझा जा सकता है जहां अहिंसा को ‘सभी प्राणियों के प्रति प्रेम और आदर के रूप में स्वीकार किया गया है। यह तथ्य इस धारणा पर आधारित है कि सृष्टि सावयव है। यद्यपि भिन्न-भिन्न प्राणियों का स्वतंत्र अस्तित्व है परन्तु सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। सृष्टि एक समुच्चय है तथा सभी प्राणी इसके अंग है। सृष्टि तथा इन प्राणियों में अंग-अंगी का संबंध है। इस सृष्टि में एक विशिष्ट प्रकार की एकता है। अत: ‘न्याय’ से अभिप्राय है इन सभी जीवों के प्रति एक समान व उचित व्यवहार। आधुनिक युग में न्याय की मुख्य समस्या यह है कि सामाजिक जीवन के अंतर्गत विभिन्न व्यक्तियों या समूहों के प्रति वस्तुओं, सेवाओं, अवसरों, लाभों, शक्ति और सम्मान के आवंटन का उचित आधार क्या होना चाहिए? परन्तु यह न्याय का संकुचित अर्थ है और इस परिभाषा का केन्द्रबिन्दु मानवमात्र है।
मानव मूल्यों की प्रकृति
रोकीच (1973) ने मूल्य के निम्नलिखित प्रकृति (स्वरूप) को बताया है-
· मूल्य की आधारशिला विश्वास होता है।
· मूल्य प्राथमिकता से सम्बन्धित है, तथा प्राथमिकता के आधार पर ही चुनाव करता है।
· मूल्य एक शाश्वत वस्तु है, जो व्यक्ति या वस्तु में अन्तर्निहित रहता है।
· मूल्य हमारे व्यवहार एवं चाल-चलन के उत्पादन की व्याख्या करता है।
· मूल्य ऐसी वस्तु का निर्माणकर्ता है जो कि सामाजिक एवं वैयक्तिक रूप से लाभप्रद कही जा सके।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि मूल्य से तात्पर्य उन सभी वस्तुओं या विचारों से हैं जिन्हें हम पसन्द करते हैं, जो पुरस्कृत एवं प्रशंसनीय होते हैं, जो सम्मानीय होते हैं, अपेक्षित आनन्द तथा संतोष देने वाले होते हैं और जिनमें व्यक्ति, समय सीमा नहीं होती है। इस प्रकार मूल्य हमारे प्रेरणात्मक पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
मूल्य हमारी अधिगम प्रक्रियाओं के सहायक तत्व हैं क्योंकि मूल्यों में उद्दीपन चुनाव की क्रिया व्यक्ति के स्वभाव एवं इच्छा से निर्देशित होती है। साथ ही अधिगमित वस्तु की धारणा, अधिगम गति एवं प्रक्रियाओं की अनुपयुक्तता आदि हमें मूल्य संबंधी आंकलन में सहायता प्रदान करती हैं।
अवधारणा
मूल्य और कीमत में अन्तर होता है। किसी वस्तु या कार्य की कीमत बाजार की स्थिति से निर्धारित होती है। इसमें मांग एवं पूर्ति का सिद्धान्त,कच्चे माल की कीमत, प्रसंस्करण और बाजार की नीति आदि सभी सम्मिलित होते हैं।कीमत वस्तुतः अर्थशास्त्रीय अवधारणा है लेकिन मूल्य नीति मीमांसीय अवधारणा हैं। किसी वस्तु या कार्य का मूल्य उससे होने वाले परिणाम, कार्यसिद्ध या उसके मूल में निहित आदि भावना से निर्धारित होता है। प्रायः किसी वस्तु या कार्य का मूल्य उसकी कीमत से भिन्न होता है। कभी-कभी यह मूल्य कीमत से कहीं अधिक और कभी-कभी कीमत की अपेक्षा अत्यधिक न्यून होता है।
मूल्य दो प्रकार के होते हैं। कुछ मूल्य स्वतः साध्य होते हैं। अर्थात् यह अपने आप में ही मूल्य होते हैं इनकी कीमतों को मुद्रा में आंकना संभव नहीं होता। कुछ मूल्य 'साधन मूल्य' होते हैं अर्थात् ये इसलिए मूल्यपूर्ण होते हैं क्योंकि इनसे किसी लक्ष्य की सिद्धि होती है। नीतिशास्त्र में दोनों प्रकार के मूल्यों की व्याख्या होती है।
मनुष्य के समक्ष सदैव कुछ वस्तुएं या कार्य महत्वपूर्ण होते हैं। मनुष्य की कुछ आवश्यकताएं होती है। जिन्हें वह विभिन्न साधनों से पूरा करता है। ये साधन ही मूल्य बन जाते हैं जिन्हें मानवीय मूल्य की संज्ञा दी जाती है। मानवीय मूल्यों को अनेक वर्गों में वगीकृत किया गया है। जैसे शारीरिक मूल्य, बौद्धिक मूल्य, नैतिक मूल्य एवं आर्थिक मूल्य आदि ।
मूल्य शब्द से तात्पर्य किसी भौतिक वस्तु अथवा मानसिक अवस्था के उस गुण से है, जिसके द्वारा मनुष्य के किसी उद्देश्य अथवा लक्ष्य की पूर्ति होती है। मूल्यों का व्यक्ति के आचरण, व्यक्तित्व तथा कार्यों पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है।
मूल्यों की विशेषताएँ
· मूल्य के दो पहलू होते हैं। प्रथम विषय-वस्तु और दूसरा तीव्रता।
· मूल्य कुछ अंश तक आंतरिक भाव होते हैं, जो व्यक्ति के व्यक्तित्त्व में प्रतिबिम्बित होते हैं।
· क्षेत्र विशेष के संदर्भ में मूल्य के महत्त्व में अंतर पाया जाता है।
· मूल्य अमूर्त होते हैं।
· मूल्य सीखे जाते हैं।
मूल्यों के प्रकार
दृष्टिकोण के आधार पर
· सकारात्मक मूल्य, जैसे- अहिंसा, शांति, धैर्य आदि।
· नकारात्मक मूल्य, जैसे- हिंसा, अन्याय, कायरता आदि।
उद्देश्य के आधार पर
· साध्य मूल्य- वे सभी वस्तुएँ या अवस्थाएँ, जो स्वयं में शुभ होती हैं।
· साधन मूल्य- जो अपने आप में शुभ न होकर किसी अन्य वस्तु के साधन के रूप में शुभ होता है।
विषय क्षेत्र के आधार पर
· सामाजिक मूल्य, जैसे- अधिकार, कर्त्तव्य, न्याय आदि।
· मानव मूल्य , जैसे- नैतिक मूल्य, आध्यात्मिक मूल्य आदि।
· नैतिक मूल्य, जैसे- न्याय, ईमानदारी आदि।
· आध्यात्मिक मूल्य, जैसेे- शांति, प्रेम, अहिंसा आदि।
· भौतिक मूल्य, जैसे- भोजन, मकान, वस्त्र आदि।
· सौंदर्यात्मक मूल्य, प्रकृति, कला एवं मानवीय जीवन के सौंदर्य को कहते हैं।
· मनोवैज्ञानिक मूल्य, जैसे- प्रेम, दया आदि।
कार्य क्षेत्र के आधार पर
· राजनीतिक मूल्य, जैसे- ईमानदारी, सेवा भाव आदि।
· न्यायिक मूल्य , जैसे- सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता आदि।
· व्यावसायिक मूल्य, जैसे- जवाबदेही, ज़िम्मेदारी, सत्यनिष्ठा आदि।
मूल्य एवं अभिवृत्ति में संबंध
समानताएँ
Ø दोनों ही सीखे जाते हैं।
Ø दोनों ही प्राय: स्थायी होते हैं।
Ø दोनों में ही व्यक्ति के व्यवहार को प्रेरित करने की क्षमता होती है।
असमानताएँ
Ø अभिवृत्ति प्राय: मूल्यों से ही उत्पन्न होती है।
Ø विशिष्ट परिस्थिति में अभिवृत्ति मूल्य को निर्धारित करती है।
Ø मूल्य तथा अभिवृत्ति परस्पर संबंधित हैं, इसलिये मूल्यों में परिवर्तन होने से अभिवृत्ति भी स्वत: बदलने लगती है।
कभी-कभी मूल्यों द्वारा अभिवृत्ति एवं व्यवहार का संबंध निर्धारित होता है। किसी विशेष मूल्य के कारण व्यक्ति का व्यवहार उसकी अभिवृत्ति से असंगत हो सकता है।
नीतिशास्त्र और लोक प्रशासन
आज के बदलते सामाजिक आर्थिक व प्रशासनिक सन्दर्भो में नीतिशास्त्र अत्यधिक प्रासंगिक हा सका पहुच अब लोक प्रशासन तक हो चकी है। वस्तत: नीतिशास्त्र का मानव आस्तत्व आचामा स कार्यात्मक सबंध है। प्रस्तत शीर्षक के अंतर्गत हम नीतिशास्त्र के विभिन्न पक्षों को लोक प्रशासन के संदर्भ में समझें। सामान्य तौर पर कुछ सूत्रों (नियमा) क सहार इन पता सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। ये हैं:-
विवकपूर्णता एवं वैधता का सूत्रः
नियम और कानन इसलिए बनाए जाते हैं ताकि विभिन्न प्रकार की नीतियों एवं इनसे जडे निर्णयों का कार्यान्वयन एवं संचालन किया जा सके। अत: एक प्रशासक स यह आशा की जाती है कि वह इन नियमों व कानूनों का अक्षरश: पालन करे।
उत्तरदायित्व एवं जवाबदेयता का सूत्रः
एक प्रशासक से यह उम्मीद की जाती है कि अपने निर्णयों एवं कार्यवाहियों की जवाबदेही लेने से वह न हिचके। स्वविवेक से किए गए निर्णयों एवं कार्यवाहियों के लिए वह स्वयं को ही नैतिक रूप से जिम्मेदार समझे। यही नहीं बल्कि अपने से ऊपर के अधिकारियों के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार करे। इसके अलावा उन लोगों के प्रति भी स्वेच्छा से जवाबदेयता स्वीकार करे जो उसके कार्यों एवं निर्णय से लाभान्वित होते हैं।
कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता का सूत्र:
एक प्रशासक से यह आशा की जाती है कि वह अपने कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्ध रहे तथा अपने कार्यों का निष्पादन पूरी संलग्नता, बुद्धिमत्ता एवं दक्षता के साथ करे। जैसा कि स्वामी विवेकानन्द ने कहा है, “प्रत्येक कार्य पवित्र होता है तथा अपने कर्तव्य श्रद्धा ही पूजा-अर्जना का सर्वोत्तम रूप है।” इन विचारों को अपनाने का अर्थ है कि व्यक्ति समयनित है, समय का आदर करता है एवं स्वयं क द्वारा किए गए वादों के प्रति भी ईमानदार है। वस्ततः कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व का वहन एक बोझ के समान नहीं होता बल्कि यह तो समाज की सेवा तथा सर प्रति रचनात्मक योगदान देने का एक अवसर होता है।
श्रेष्ठता का सूत्रः
एक प्रशासक से यह आशा की जाती है कि अपने प्रशासनिक कार्यों को के दौरान वह सर्वोत्तम मानक अपनाएगा तथा सुविधा एवं आत्मसंतुष्टि के लालच में किसी एक समझौता नहीं करेगा। वर्तमान में अन्तरराष्ट्रीय परिवेश में तीव्र प्रतिस्पर्दा है। अत: एक प्रशासनिक के लिए यह आवश्यक है कि वह उत्कृष्ट एवं व्यापक प्रबंध कौशल के सभी शर्तों को पूरा करे।
संयोजन का सूत्रः
एक प्रशासक व्यक्ति, संगठन तथा समाज से जुड़े लक्ष्यों में कोई फर्क नहीं करेगा बल्कि उद्देश्य को एकता सुनिश्चित करने का प्रया करेगा। यही नहीं अपने आचरण से भी उद्देश्य की एकता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखलाएगा तथा हितों के बीच संघर्ष की स्थिति में वह नैतिक मानदंडों के आधार पर नित्य सही चुनाव करेगा।
अनुक्रियाशीलता एवं लचीलापन का सूत्रः
एक प्रशासक से यह आशा की जाती है वह प्रशासन के अन्दर व बाहर की चुनौतियों के प्रति प्रभावशाली एवं सकारात्मक रवैया अपनाए एवं बदलते परिवेश के साथ सामजस्य बिठाने के दौरान नैतिक आदर्शों से न डिगे। नैतिक मानकों से परे जाने की स्थिति में भी एक प्रशासनिक तत्र में इतना लचीलापन अवश्य होना चाहिए ताकि अवसर आने पर यथा शीघ्र इसे नैतिक मानकों के अनुरूप ढाला जा सके।
उपयोगितावाद का सूत्र:
एक प्रशासक से इस बात की आशा की जाती है कि नीतियों एवं निर्णयों के निर्माण एवं कार्यान्वयन के दौरान वह अधिकतम लोगों का अधिक कल्याण सुनिश्चित करे।
करुणा एवं संवेदनशीलता का सूत्र:
एक प्रशासक से यह आशा की जाती है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपने स्वविवेक का प्रयोग करते हुए वह गरीब, कमजोर तथा असहायों के प्रति करुणा व संवेदनशीलता का दृष्टिकोण अपनाए और इस दौरान वह प्रचलित नियमों व कानूनों की अवज्ञा भी न करे। कम से कम वह इस बात को अवश्य सुनिश्चित करे कि समाज के कमजोर वर्ग उसके द्वारा दिए गए लाभों से वंचित न हो सिर्फ इसलिए कि वे कमजोर और पिछड़े हैं। दूसरे शब्दों में, समाज के सबल वर्ग को सिर्फ इसलिए लाभ न मिले क्योंकि वे समाज के सशक्त व प्रभावशाली तबके से है।
राष्ट्रीय हित का सूत्रः
वैसे तो लोक सेवक उदार चरित्र एवं व्यापक दृष्टिकोण वाले समझे जाते हैं परंतु फिर भी इनसे इस बात की आशा की जाती है कि अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते समय इस बात का ध्यान अवश्य रखेंगे कि उनके कार्यों से राष्ट्र की शक्ति व प्रतिष्ठा का कोई प्रतिकूल असर न पड़े। इससे राष्ट्र के प्रति उनकी सेवा की गुणवत्ता बढ़ेगी। जापान, कोरिया, जर्मनी तथा चीन की आम जनता तथा लोक सेवक शासकीय कर्तव्यों के निष्पादन के दौरान अपने राष्ट्र की प्रतिष्ठा और गरिमा का हमेशा ध्यान रखते हैं।
न्याय का सूत्रः
ऐसा समूह जो शासन से संबंधित नीतियों एवं निर्णयों के निर्माण एवं संचालन के लिए उत्तरदायी हैं, से आशा की जाती है कि वे इस बात को सुनिश्चित करेंगे कि शासन के दौरान समानता, निष्पक्षता, न्यायसंगतता तथा वस्तुनिष्ठता के नियमों का पालन किया जा रहा है तथा किसी व्यक्ति को सिर्फ शक्ति, सत्ता, वर्ग, जाति, लिंग या धन के आधार पर अनावश्यक लाभ तो नहीं मिल रहा है।
पारदर्शिता का सूत्रः
एक प्रशासक से यह आशा की जाती है कि उसके द्वारा लिए गए निर्णय एव उसके कार्यान्वयन में पारदर्शिता हो ताकि वे लोग भी जो इन निर्णयों से लाभान्वित हुए हों, निर्णय के आचित्य का मूल्यांकन कर पाएं तथा यह भी जान पाएं कि आखिर सूचनाओं के वे स्रोत क्या हैं जिनके आधार पर इस तरह के निर्णय लिए जाते है।
ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठता का सूत्रः:
एक प्रशासक से यह आशा की जाती है कि उसकी कायवाही ईमानदारी पर आधारित हो तथा अपनी शक्ति प्रतिष्ठा व स्वविवक का प्रयोग वह योग वह स्वयं के हित में या फिर अन्य लोगों को गैर-जरूरी लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से न करे।
लोक संबंध
संगठन चाहे निजी हो या सरकारी, इनके व्यवस्थित संचालन में लोक संबंधों की भूमिका अहम होती जा रही हैये न सिर्फ संगठन के निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं बल्कि जनमत पर भी इनका असर होता दिख रहा है। वर्तमान में लोक संबंध से जडे कार्य किसी भी संस्था या संगठन के लिए अपारहाय माने जाने लगे हैं। इसकी बढ़ती हुई महत्ता के कारणों को निम्नलिखित रूप में रेखांकित किया जा सकता है:
· लोक संबंधों के लिए किये गए पहल के द्वारा सचना की स्वतंत्रता तथा अभिव्यक्ति के अधिकार को स्वीकृति व पहचान मिलती है।
· दूरसंचार तथा यातायात के क्षेत्र में हई प्रगति से भी लोक संबंधों को प्रोत्साहन मिल रहा है।
· वर्तमान में वैश्वीकरण के बढ़ते प्रभाव एवं पारंपरिक रूप से बंद समाजों में आए खलेपन से भी लोक संबंधों को समर्थन मिलने लगा है।
· स्वयं सरकार भी सत्ता में बने रहने के अलावा विकासात्मक कार्यों के लिए भी लोक संबंधों की दिशा में पहल कर रही है।
· वर्तमान में व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने, नये-नये उपक्रमों के खुलने, इनके बीच व्यावसायिक गठजोड़ के बनने तथा दूसरे देशों एवं दूसरी संस्कृतियों तक बिजनेस-व्यापार के संचालन में भी लोक संबंधी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है।
लोक संबधों में नैतिकता
किसी भी संस्था या संगठन द्वारा लोक संबंधों के लिए की जाने वाली पहल एक लम्बी कार्य योजना है। इसके अन्तर्गत इस बात का प्रयास किया जाता है कि लोग संस्था/संगठन से जुड़े विचारों एवं मनोवृतियों को स्वेच्छा से अपनाएं ताकि आम जनता एवं संगठन के बीच पारस्परिक समझ व संबंध कायम हो। यह तभी संभव है जब लोक संबंधों के लिए तैयार की गई नीतियां कुछ नैतिक मानकों पर आधारित हो तथा इसके लिए इस्तेमाल किए जाने वाले स्त्रोत व साधन वैध हों। लोक संबंधों का महत्तम लक्ष्य चाहे कितना भी वैध हो परंतु इसके साधन के रूप में छल, बल या झूठ-फरेब को किसी भी स्थिति में वैध नहीं ठहराया जा सकता।
हलांकि, क्या नैतिक है और क्या अनैतिक यह तय करना एक दुष्कर कार्य है परंतु सहज शब्दों में कहा जाए तो अपने विवेक तथा अंत: अनुभूति के आधार पर सही और गलत विकल्पों का चुनाव ही नैतिक और अनैतिक के फर्क को स्पष्ट कर देता है। कुछ भी ऐसा जो वैध और उचित न हो, व्यक्ति के मन में असंतोष पैदा करता है और वह अपराध बोध से ग्रस्त हो जाता है। झूठ और फरेब के आधार “पर संबंधों को कभी भी मजबूत नहीं बनाया जा सकता। आम जनता को कम आँकना और उन्हें बेवकूफ समझना किसी भी स्थिति में उचित नहीं। अब्राहम लिंकन के शब्दों में, “कुछ लोगों को हमेशा बेवकूफ । बनाया जा सकता है, सभी लोगों को थोड़े समय के लिए बेवकूफ बनाया जा सकता है लेकिन सभी लोगों को हमेशा बेवकूफ बनाना संभव नहीं।” कई ऐसे कार्य हैं जिन्हें लोक संबंध के संदर्भ में अनैतिक अर्थात् नैतिक मानकों के खिलाफ माना जाता है, जैसे महत्वपूर्ण सूचनाओं को छिपाना या फिर लोगों को गुमराह करना। ऐसे ही कुछ अन्य अनैतिक कार्य व्यवहार इस प्रकार हैं-
· संस्था/संगठन से जुड़े नकारात्मक सूचनाओं को प्रेक्षित न करना।
· तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश करना।
· किसी मुद्दे के लिए संघर्ष करने के बजाए उसे स्थगित करने का निश्चय कर अपना ही कोई हित साधना।
· वे वादे करना जिन्हें पूरा नहीं किया जा सकता।
· सम्पादकों पर गलत तरीके से दबाव बनाकर उनसे ऐसी सूचनाएं छपवाना जो प्रचार का माध्यम बने।
आजकल लोगों में शिक्षा का प्रसार बड़ी तेजी से हो रहा है। जनता अपने अधिकारों के प्रति सजग हो गई है। ऐसे में लोक संबंध से जुड़े अधिकारियों के समक्ष नयी चुनौतियाँ आ रही हैं क्योंकि अब उन्हें व्यापार संबंधों, उपभोक्ता संरक्षण समूहों तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यकर्ताओं से भी निपटना पड़ सकता है। अत: लोक संबंध अधिकारियों के लिए अब यह आवश्यक हो गया है कि वे अपने आचरण को नियमित करें, नैतिकता के मानदंडों की अनदेखी न करें तथा लोगों को साथ बातचीत के दौरान कानूनी पेचीदगियों को भी ध्यान रखें।
लोक संबंधों में नैतिक मूल्य
लोक सेवा में नैतिक मूल्यों व नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। परन्तु इन नैतिक मूल्यों व मानकों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करना एक कठिन कार्य है जबकि यह सच है कि ये ही वस्तुत: लोक सेवा की प्रकृति को परिभाषित करते हैं साथ ही उसे एक मजबूत आधार भी प्रदान करते है। दरअसल आचरण के ये मानक जनता एवं लोक सेवक दोनों ही के लिए अपरिहार्य हैं और उनके कार्य-व्यवहार के लिए एक ढांचा प्रस्तुत करते हैं जिसके दायरे में ही लोक सेवा व लोक संबंधों का स्वस्थ संचालन संभव है। खासकर लोक सेवकों के लिए इन नैतिक मूल्यों व नियमों की महत्ता इस बात में भी है कि इनके प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोण अपनाने के कारण ही वे जनता को कुशल व प्रभावी सेवा प्रदान कर पाते है। इन नैतिक सिद्धान्तों को एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है जिसे नोलान कमिटी (ग्रेट ब्रिटेन) द्वारा प्रस्तुत किया गया था। यह सिद्धान्त इस प्रकार हैं:
नि:स्वार्थता:
लोक सेवा से जुड़े अधिकारियों को अपने सारे निर्णय सिर्फ लोकहित में ही लेना चाहिए। लोक सेवक होने के नाते उन्हें ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए जिससे स्वयं उन्हें या फिर उनके परिवार व मित्रों को वित्तीय लाभ या अन्य फायदा पहुंचे।
सत्यनिष्ठाः
लोक सेवा से जुड़े अधिकारियों को आम जनता या बाह्य संगठनों से किसी प्रकार का वित्तीय लाभ या अन्य फायदे स्वीकार नहीं करना चाहिए। इससे उनके कर्त्तव्य निष्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। दूसरे शब्दों में, उनकी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
वस्तुनिष्ठताः
लोक सेवा से जुड़े अधिकारियों को अपने कार्य व्यापार में, जैसे लोगों से मिलने-जुलने, ठेका आवंटन अथवा लाभ और पुरस्कार की घोषणा आदि में योग्यता के आधार पर ही चुनाव करना चाहिए।
जवाबदेयता:
लोक सेवा से जुड़े अधिकारीगण अपने निर्णयों एवं कार्यवाहियों के लिए जनता के प्रति जवाबदेय होते हैं। अत: इनके कार्यों की समीक्षा किए जाने की स्थिति में उन्हें अनिवार्य रूप से आज्ञाकारी और विनम्र बने रहना चाहिए।
खुलापन:
लोक सेवकों को अपने कार्यों एवं निर्णयों में यथासंभव पारदर्शिता बरतनी चाहिए। अपने निर्णयों के लिए उन्हें ठोस युक्ति व कारण बताना चाहिए तथा सूचना की गोपनीयता तब तक बरतनी चाहिए जब तक कि व्यापक जनहित में इसका खुलासा अनिवार्य न हो।
ईमानदारी:
लोक सेवकों का यह कर्तव्य है कि वे लोक स्पष्टीकरण करें तथा निजी हित और लोकहित के बीच संघर्ष की कि लोकहित को ही प्रमुखता मिले।
नेतत्व:
लोक सेवकों को अपने नेतृत्व की क्षमता व अन्य उदाहरणों के माध्यम से नैतिक मूल्योंका समर्थन व प्रसार करना चाहिए।
मानवीय मूल्य: महान नेताओं के जीवन से शिक्षा
समूचे विश्व में कई महान और युग प्रवर्तक नेता हुए हैं जिनमें कुछ प्रमुख है- महात्मा गांधी, अब्राहम लिंकन मार्टिन लुथर, नेल्सन मंडेला, वाक्लव हेवेल, मैडम आंग सा सू की तथा मदर टेरेसा। इनका नैतिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक उपलब्धियों से जिन मानवीय मूल्यों पर प्रकाश पड़ता है उसकी एक सूची यहां प्रस्तुत की जा रही है। ये हैं:
· न्याय के प्रति प्रेम और लगाव
· नि:स्वार्थता
· मानवता के प्रति आदर
· प्रत्येक के लिए गरिमा
· स्नेहिल और यथोचित व्यवहार
· अहिंसा और शान्ति के प्रति आस्था
· परोपकारिता
· करुणा व सहानुभूति ।
महान प्रशासकों के जीवन से शिक्षा
हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारी वर्तमान पीढी सौभाग्यशाली है क्योंकि उसमें विश्व के कछ सर्वोत्तम प्रशासक पैदा हुए है। इनमें वर्गीस कुरियन, एम.एस. स्वामीनाथन सैम पित्रोदा, ई. श्रीधरन, सी.डी. देशमुख, आई.जी. पटेल, वी.पी. मेनन तथा जीवीजी कणामति का नाम मुख्य रूप से लिया जा सकता है। इनकी उपलब्धियों से यह स्पष्ट है कि अपने कार्यों में इन्होंने मानवीय मल्या का हम समिकता दी। यहां उन व्यावसायिक एवं मानवीय मूल्यों की एक सूची प्रस्तुत की जा रहा है से इन प्रशासकों के लिए मार्गदर्शक साबित हुए। ये हैं-
· सत्यनिष्ठता
· भेदभाव का विरोध
· अनुशासन
· एक नागरिक के रूप में कर्तव्यपरायणता
· सामाजिक समानता
· कानून के प्रति सम्मान
· नैतिक जवाबदेयता का बोध
· साहस
· आदर और भाईचारा
महान सुधारकों के जीवन से शिक्षा
भारत में कबीर, गुरूनानक देव, राजाराम मोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद जैसे कई समाज सुधारक पैदा हुए जिन्होंने समाज में व्याप्त कुप्रथाओं का पुरजोर विरोध किया तथा कई सामाजिक धार्मिक मुद्दों पर समाज को पुनर्जागृत किया। उनकी उपलब्धियों से जिन मानवीय मल्यों पर प्रकाश पड़ता है उसकी एक सूची कुछ इस प्रकार है:-
· मानवता के प्रति आदर
· प्रत्येक की गरिमा का ध्यान
· मानवतावाद
· तर्क और अन्वेषण के सहारे सत्य की खोज
· दयालुता और करुणा
· आत्मसंतोष
· सामाजिक समानता ।
मानवीय मूल्यों के आत्मसातीकरण में परिवार की भूमिका
परिवार ही प्राथमिक इकाई है जहां व्यक्ति का समाजीकरण होता है। बच्चे के व्यक्तित्व के निस में परिवार की अहम् भूमिका होती है। परिवार ही बालक को समाज का एक योग्य सदस्य बनाता है। परिवार उसे आचरण संबंधी नियमों से परिचित कराता है। परिवार में बालक के अनेक मानवीय मल्यों का विकास होता है। वह प्रेम, आत्म-त्याग, परोपकार, कर्त्तव्य और आज्ञापालन तथा सहयोग का पाठ सीखता है। यह बालकों में सद्भावनाओं का संचार करता है। कई अध्ययनों से यह प्रमाणित हो चका है कि जिन परिवारों में सदस्यों के बीच स्वस्थ संबंध रहते है, ज्यादातर उसी परिवारों के बच्चे सफलता और बड़ी-बड़ी उपलब्धियां कायम करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि एक संगठित परिवार ही अपने सदस्यों को मानसिक सुरक्षा प्रदान करता है तथा जीवन में महान कार्य करने की असीम प्रेरणा भी देता है। परिवार के द्वारा दी गई मनोवैज्ञानिक सुरक्षा में ही बालक का मानसिक और बौद्धिक विकास हो जाता है जिससे बालक यह समझने लगता है कि व्यक्ति और समाज के प्रति उसका व्यवहार कैसा होना चाहिए।
मल्यों के आत्मसातीकरण में समाज की भूमिका
प्रशासन से संबंधित नैतिक मूल्य व मानक उस समाज में प्रचलित सामान्य नैतिक मूल्यों व मानकों का ही एक रूप है, अर्थात् किसी समाज अथवा समुदाय एवं वहां के अभिशासकों के नैतिक मूल्यों व आदर्शों में फर्क नहीं किया जा सकता। समाज शब्द का प्रयोग बहधा व्यक्तियों के एक ऐसे समूहों या सामाजिक साहचर्य के एक ऐसे रूप के लिए किया जाता है जिसके सदस्य एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में रहते हैं और जिनमें एकत्व की भावना, अन्तरिस्परिकता, साझा संस्कृति तथा संगठित क्रियाकलापों जैसी विशेषताएँ होती है। फाइनर के शब्दों में, “सूक्ष्म विश्लेषण करने पर यह पाया जा सकता है कि किसी संस्था, संगठन या व्यवसाय से जुड़े नैतिक मापदंड उस देश में प्रचलित नैतिक मानकों व मूल्यों से कम या ज्यादा नहीं होता बल्कि उसी के अनुरूप होता है जिस देश में ये संस्था, संगठन या व्यवसाय संचालित रहते हैं, अर्थात् किसी संगठन या व्यवसाय के लिए तय किए नैतिक मूल्यों पर वहां की सभ्यता व बाह्य परिवेश की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
किसी देश की सरकार की सफलता वहां के नागरिकों को जागरूकता एवं शासन में उनकी भागीदारी पर निर्भर करती है। यही कारण है कि नागरिकशास्त्र की सभी पुस्तकों में देश को प्रगति में वहां की जनचेतना की भूमिका को सबसे अहम बताया जाता है। जनचेतना एवं जागरूकता के माध्यम से देश की प्रगति तभी संभव है जब वहां की शिक्षा व्यवस्था तथा मीडिया नागरिकों के चरित्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का सही तरीके से निर्वाह करे। किसी देश में नागरिकों के चरित्र ही वह स्त्रोत है जिनसे देश के विकास व आधुनिकीकरण को ऊर्जा मिलती है।
ऐसे में शिक्षा, वयस्क शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा के माध्यम से लोगों में देश प्रेम, अनुशासन व नागरिक चेतना प्रदान करने की परजोर आवश्यकता है। इससे लोक सेवकों को सभी समुदायों के लोगों का सहयोग मिल सकेगा तथा शासन में जनभागीदारी बढ़ेगी। ऐसे में लोक सेवक भी कठिन पारश्रम के लिए उद्यत होंगे ताकि जनता का समग्र विकास सनिश्चित हो।
मूल्यों के आत्मसातीकरण में शिक्षण संस्थानों की भूमिका
नैतिक मूल्यों के आदान-प्रदान में शिक्षा का की महत्वपूर्ण भूमिका होती है शिक्षा व्यक्ति को इस बात के लिये तैयार करती है कि वह सामाजिक परिवर्तन को नेतत्व प्रदान करे । शिक्षा व्यक्ति में अनुकलनकारी व्यक्तित्व का विकास करके परिवर्तन की प्रक्रिया में सहयोग प्रदान करती है। यह नवीन मल्यों एवं विचारों के आत्मसातीकरण में सहायक होती है और व्यक्ति को किसी विशिष्ट दिशा में परिवर्तन हेतु बौद्धिक एवं भावनात्मक रूप से तैयार करती है। शिक्षा समाज एवं संस्कृति की निरन्तरता के साथ-साथ उसमें वांछित सुधार एवं परिवर्तन में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।
परन्तु इसके लिए शिक्षा-व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे प्रशिक्षु की स्वायत्तता व स्वतंत्रता बाधित न हो। किसी व्यक्ति के शैक्षणिक विकास के कई उद्देश्य हो सकते हैं जिनमें प्रमुख हैं- ज्ञानार्जन, संस्कृति-संरक्षण, व्यक्तित्व का विकास, सामाजिक न्याय की प्रगति, वैज्ञानिक मनोदशा का विकास, लोकतंत्र की सफलता तथा धर्मनिरपेक्ष मनोवृत्ति का विकास आदि। ये गुणात्मक रूप से उच्चतर एवं बेहतर जीवन की प्राप्ति में सहायक होते हैं। यह शिक्षा ही है जिसके माध्यम से समाज उच्च मानवीय मूल्यों का संरक्षण करती है और साथ में उन्हें प्रोत्साहन भी देती है।
मानवीय मूल्य वे मानवीय मान, लक्ष्य या आदर्श हैं जिनके आधार पर विभिन्न्ा मानवीय परिस्थितियों तथा विषयों का मूल्यांकन किया जाता है। वे मूल्य व्यक्ति के लिए कुछ अर्थ रखते हैं और उन्हें व्यक्ति अपने सामाजिक जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण समझते हैं। इन मूल्यों का एक सामाजिक-सांस्कृतिक आधार या पृष्ठिभूमि होती है, इसीलिए प्रत्येक समाज के मूल्यों में हमें भिन्न्ाता मिलती है।1 भारतीय समाजों में हिन्दुओं में विवाह के प्रति एक विशिष्ट सामाजिक मूल्य यह है कि विवाह-बंधन एक पवित्र व धार्मिक बन्धन है, इस कारण इसे अपनी इच्छानुसार तोड़ा नहीं जा सकता है। साथ ही यह पवित्रता तभी बनी रह सकती है जबकि पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति वफादार हों। इन मूल्यों का सामाजिक प्रभाव यह होता है कि हिन्दुओं में विवाह-विच्छेद की भावना पनप नहीं पाती है और विधवा-विवाह को उचित नहीं माना जाता है। इसके विपरीत अमेरिकन समाज में विवाह से सम्बन्धित इन मूल्यों का नितान्त अभाव होने के कारण विवाह विच्छेद या विधवा विवाह निन्दनीय नहीं है। सामाजिक मूल्य सामाजिक मान है जो कि सामाजिक जीवन के अन्तः सम्बन्धों को परिभाषित करने में सहायक होते हैं। मूल्यों के द्वारा सभी प्रकार की ‘वस्तुओं’ का मूल्यांकन किया जा सकता है, चाहे वे भावनाएँ हो या विचार, क्रिया, गुण, वस्तु, व्यक्ति, समूह, लक्ष्य या साधन। मूल्यों का एक उद्वेगात्मक आधार होता है। और भी स्पष्ट रूप में, मूल्य समाज के सदस्यों के उद्वेगों को अपील करता है और उन्हीं के भरोसे जीवित रहता है। व्यक्ति जब किसी चीज के विषय में विचार करता है, निर्णय लेता या मूल्यांकन करता है तो उस पर उद्वेग का प्रभाव स्पष्ट रहता है। एक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। हिन्दुओं में विवाह से सम्बन्धित एक दृष्टि मूल्य अन्तःविवाह है, अर्थात् इस सामाजिक मूल्य के अनुसार व्यक्ति को अपनी ही जाति या उपजाति में विवाह करना चाहिए। इसके विपरीत यदि कोई अन्तर्जातीय विवाह करता है तो सामान्यतः यह देखने में मिलता है कि उस विवाह की चर्चा दाम्पत्ति के परिवारों में, पड़ोस या गांव में, मित्र-मंडलियों में बड़े उत्साह से उद्वेगपूर्ण शब्दों में की जाती है। उनके वार्तालाप से ऐसा लगता है मानों उन्हीं का सब कुछ छिन गया है या उन्हीं पर कोई आफत आ पड़ी है। उसी प्रकार यदि विवाह के पश्चात् नव-दम्पत्ति संयुक्त-परिवार से अलग हो जाते हैं तो उस दम्पत्ति की विशेषकर वधू की निन्दा होती है क्योंकि हिन्दुओं का सामाजिक मूल्य संयुक्त परिवार के पक्ष में है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति धर्म, त्याग, अहिंसा के सिद्धान्तों पर अटल रहकर अपना प्राण तक दे देता है। तो उसकी प्रशंसा में लोग मुखारित हो उठते हैं क्योंकि उस व्यक्ति ने स्वीकृत मूल्यों को मान्यता दी है। सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों या विभिन्न क्रिया-कलाप से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार के मूल्य होते हैं यदि परिवार के पिता से सम्बन्धित कुछ मूल्य होते हैं, तो सम्पूर्ण राष्ट्र के शासन के सम्बन्ध में भी मूल्य हुआ करते हैं। उसी प्रकार विवाह के सम्बन्ध में, सामाजिक, सहवास, धार्मिक आचरण, राजनीति, आर्थिक जीवन आदि के सम्बन्ध में एकाधिकार मूल्य होते हैं। उसी प्रकार, समस्त मूल्यों में एक बोधात्मक तत्त्व होता है और वह इस अर्थ में कि एक व्यक्ति को ‘क्या उचित है’ की धारणा उसके ‘क्या है’ या ‘क्या संभव है’ की धारणा पर निर्भर करती है। अतः स्पष्ट है कि मूल्य आदर्श-नियमों में घनिष्ट रूप से सम्बन्धित होते हैं। इतने घनिष्ट रूप में कि इन दोनों में अंतर करना कभी-कभी कठिन हो जाता है। आदर्श नियमों को, जॉनसन के अनुसार, विस्तृत दृष्टिकोण से देखने पर मूल्य तथा आदर्श-नियम के बीच पाए जाने वाले अंतर स्वतः ही गायब हो जाते हैं। राधाकमल मुकर्जी ने लिखा है, ‘‘मूल्य समाज द्वारा मान्यता प्राप्त इच्छाएँ एवं लक्ष्य हैं जिनकी अन्तरीकरण सीखने या सामाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से होता है और जो व्यक्तिनिष्ठ अधिमान, मान तथा अभिलाषाएँ बन जाती हैं। आपके विचार से समाज वैज्ञानिकों द्वारा मूल्य को उचित रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। उदाहरणार्थ, मनोविज्ञान में मूल्यों को केवल अधिमानों के रूप में परिभाषित किया गया है, जबकि अन्य सामाजिक विज्ञानों के मूल्यों को क्रियाशील अवश्यकरणीय या कत्र्तव्यों के रूप में प्रस्तृत किया गया है। परन्तु ये सब मूल्यों की वास्तविक प्रकृति को स्पष्ट नहीं करते। मूल्यों की उत्पत्ति एक सामाजिक संरचना विशेष के सदस्यों के बीच होने वाली अन्तःक्रियाओं के फलस्वरूप धीरे-धीरे होती है। वास्तव में मनुष्य को अपने परिस्थितिगत पर्यावरण से एक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता होती है, अपने जीवन-निर्वाह व भरण-पोषण सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना होता है, अपने समाज या समूहों के अन्य लोगों के साथ सामाजिक का सामना करना होता है, अपने समाज या समूहों के अन्य लोगों के साथ सामाजिक-जीवन में भागीदार बनना पड़ता है एवं अपने व्यक्तित्व व संस्कृति के बीच आदान-प्रदान की प्रक्रिया में भी सम्मिलित होना पड़ता है। ऐसी स्थिति में यदि समाज के सदस्यों के लिए समाज द्वारा कुछ अधिमानों, मानदंडों तथा सामूहिक अभिलाषाओं को व्यवहार के आधार के रूप में प्रस्तुत न किया जाए तो समाज में अव्यवस्था, असुरक्षा और अशांति का ही राज्य होगा। इस स्थिति को टालने के लिए ही समाज द्वारा मान्यताप्राप्त कुछ मानदंड, इच्छाएँ एवं लक्ष्य विकसित किए जाते हैं। और वे समाज में प्रचलित रहते हैं, जिन्हें कि व्यक्ति सीखने या समाजीकरण की प्रक्रिया के दौरान अपने व्यक्तित्व में सम्मिलित कर लेता हैं। अतः मनुष्य को मूल्य अपने जीवन से, अपने पर्यावरण से, अपने-आप(स्वयं) से, समाज और संस्कृति से ही नहीं अपितु मानव-अस्तित्व व अनुभव से प्राप्त होते हैं।’’2 स्पैंगर ने 6 आधारभूत प्रकार के मूल्यों का वर्णन किया है जो हैं-
(1) सैद्धांतिक या बौद्धिक,
(2) आर्थिक या व्यवहारिक,
(3) सौदर्यबोधी,
(4) सामाजिक या परार्थवादी,
(5) राजनीतिक या सत्ता-सम्बन्धी,
(6) धार्मिक या रहस्यात्मक।
मुखर्जी, ऑलपोर्ट तथा बरनॉन के इस मत से सहमत हैं, कि स्पैंगर का उपरोक्त वर्गीकरण समग्र रूप से निर्भरयोग तथा उपयोगी है। फिर भी आपके मतानुसार यह अधिक अच्छा हो यदि मूल्यों को हम दो मुख्य वर्गों में -(1) साध्य मूल्य, (2) साधन मूल्य के रूप में विभाजित करें। यहाँ यह कहना उचित होगा कि मुकर्जी द्वारा प्रस्तुत यह वर्गीकरण लीविस द्वारा उल्लेखित साध्य या अन्तर्निष्ट एवं बाह्य या साधन मूल्यों तथा गोलाइटली द्वारा परिभाषित मौलिक एवं क्रियात्मक मूल्यों की धारणा पर आधारित है।3 मुकर्जी के अनुसार, ‘साध्य मूल्य’ वे लक्ष्य तथा संतोष है जिन्हे मनुष्य तथा समाज जीवन तथा मस्तिष्क के विकास व विस्तार की प्रक्रिया में अपने लिए स्वीकार कर लेता है, जो व्यक्ति के आचरण में अन्तर्निष्ठ होते हैं और जो स्वयं साध्य होते हैं। उदाहरण ‘सत्य’, ‘शिव’ और ‘सुन्दर’ से सम्बन्धित मूल्य मनुष्य के आन्तरिक जीवन से सम्बन्धित हैं जो स्वतः ही पूर्ण हैं। इसके विपरीत, ‘साधन मूल्य’ वे मूल्य हैं जिन्हें मनुष्य और समाज प्रथम प्रकार के मूल्यों की सेवा हेतु एवं उन्हें उन्नत करने के साधन के रूप में मानते हैं। स्वास्थ्य, सम्पत्ति, सुरक्षा, पेशा, प्रस्थिति आदि से सम्बन्धित मूल्य ‘साधन मूल्य’ हैं क्योकि इनका उपयोग कतिपय लक्ष्यों व संतोषों की प्राप्ति के साधन के रूप में किया जाता है।4 साध्य मूल्यों को अमूर्त या लोकातीत मूल्य एवं साधन मूल्यों को विशिष्ट या अस्तित्वात्मक मूल्य कहकर भी पुकारा जा सकता है। साध्य, अमूर्त या लोकातीत मूल्यों का सम्बन्ध समाज व व्यक्ति के जीवन को उच्चतम आदर्शों तथा लक्ष्यों से होता है, जबकि साधन, विशिष्ट या अस्तित्वात्मक मूल्यों को लौकिक लक्ष्यों की पूर्ति के साधन या उपकरण के रूप में प्रयोग किया जाता है। फिर भी, इन साधन मूल्यों के उचित चुनाव व बद्धिमत्तापूर्वक उपयोग के बिना साध्य या लोकातीत मूल्यों की परिपूर्णता सम्भव नहीं। इस सम्बन्ध में यह भी स्मरणीय है कि औसत रूप में मनुष्य का सम्बन्ध साध्य मूल्यों की अपेेक्षा साधन मूल्यों से अधिक होता है। इसीलिए इन्हीं साधन मूल्यों, उनकी परिस्थितियों एवं परिणामों की विवेचना सामाजिक विज्ञान द्वारा की जाती है। सभी मूल्य एक ही स्तर के नहीं होते अपितु उनमें एक संस्तरण देखने को मिलता है। इस संस्तरण का सम्बन्ध मूल्यों के आयामों से होता है। मूल्यों के तीन आयाम-
(1) जैविक,
(2) सामाजिक एवं
(3) आध्यात्मिक हैं।
सामाजिक मूल्य स्वास्थ्य, जीवन-निर्वाह, कुशलता, सुरक्षा आदि से सम्बन्धित होते हैं। सामाजिक मूल्य सम्पत्ति, प्रस्थिति, प्रेम तथा न्याय सम्बन्धी होते हैं तथा अध्यात्मिक मूल्य सत्य, सुन्दरता, सुसंगति तथा पवित्रता विषयक होते हैं। आध्यात्मिक मूल्य का स्तर सबसे ऊँचा होता है क्योंकि इसकी विशेषता आत्म-लोकातीतत्त्व हैं। इसीलिए यह साध्य मूल्य या अन्तर्निष्ट मूल्य या लोकातीत मूल्य का प्रतिनिधित्व करता है। इसके बाद सामाजिक मूल्यों का स्थान होता है जिसका कि उद्देश्य सामाजिक संगठन व सुव्यवस्था को बनाए रखना होता है। इसीलिए इन्हें साधन मूल्य, ब्राह्य मूल्य या क्रियात्मक मूल्य की सज्ञा दी जाती है। अन्त में, जैविक मूल्यों का स्थान है जोकि जीवन को बनाए रखने तथा आगे बढ़ाने के लिए होते हैं और इसीलिए इन्हें भी साधन, ब्राह्य या क्रियात्मक मूल्य कहा जाता है। इन सभी बातों को मुकर्जी ने एक सारणी के अन्तर्गत प्रस्तुत किया है।
मानव जीवन का आरम्भ, अस्तित्व व निरन्तरता जैविक आधार पर ही निर्भर है-शरीर बना रहेगा, स्वस्थ व उपयुक्त होगा तभी जीवन-निर्वाह एवं उसकी अग्रगति सम्भव होगी। इसीलिए मूल्यों के सोपान या संस्तरण में जैविक मूल्यों का उल्लेख पहले किया गया है। पर जैविक जीवन समाज की सहायता के बिना सम्भव नहीं। इसीलिए जीवन मूल्यों के बाद ही सामाजिक मूल्यों का स्थान है पर जैविक व सामाजिक जीवन की वास्तविक सार्थकता ‘सत्यम, शिवम्, सुन्दरम्’ की प्राप्ति में ही निहित है जोकि जैविक व सामाजिक स्तर से गुजरते हुए ही सम्भव है। इसीलिए आध्यात्मिक मूल्यों को सबसे अन्त में, मानव-जीवन के अन्तिम लक्ष्य के रूप में रखा गया है। इस दृष्टि से आध्यात्मिक मूल्य सर्वोच्च प्रकार का मूल्य है, सामाजिक और जैविक मूल्यों के स्थान क्रमशः उसके बाद हैं। अतः मूल्यों के सोपान में प्राथमिकता एवं आरोहण के सम्बन्ध में डा.मुकर्जी का निष्कर्ष या सामान्यीकरण निम्नवत है।
मूल्यों का सोपान एवं संस्तरण क्रम मूल्यों के आयाम मूल्यों के गुण मूल्यों का संस्तरण (1) जैविकः स्वास्थ्य, उपयुक्तता, कुशलता, सुरक्षा, निरंतरता साधन मूल्य, ब्राह्य मूल्य, क्रियात्मक मूल्य जीवन-निर्वाह, अग्रगति (2) सामाजिकःसम्पत्ति, प्रस्थिति, प्रेम, एवं न्याय साधन मूल्य, ब्राह्य मूल्य, क्रियात्मक मूल्य सामाजिकसंगठन, सुव्यवस्था (3) आध्यात्मिकःसत्य, सौदर्य, सुसंगति तथा पवित्रता साधनमूल्य, अंतर्निष्ठमूल्य, लोकातीतमूल्य आत्म-लोकातीतकरण समाज मूल्यों का एक संगठन व संकलन है। मूल्य सामाजिक क्रिया में सामूहिक अनुभव होते हैं जिनका निर्माण वैयक्तिक तथा सामाजिक दोनों ही प्रकार के सामूहिक दोनों ही प्रकार के प्रत्युत्तरों तथ्यों मनोवृत्तियों द्वारा होता है। ये मूल्य समाजों का निर्माण करते हैं और सामाजिक सम्बन्धों को संगठित। समाज या मानवीय या सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित जो मूल्य होते हैं उनमें एक प्रकार्यात्मक सम्बन्ध होता है जिसके कारण सामाजिक सम्बन्धों का ताना-बाना टूटता नहीं और उनमें एक तालमेल की स्थिति बनी रहती है जिसके परिणामस्वरूप समाज में व्यवस्था व सन्तुलन बना रहता है। उदाहरणार्थ, परिस्थितिगत स्तर पर प्राकृतिक साधनों के उपयोग सम्बन्धी कुछ मूल्य होते हैं जिसके कारण परिस्थितिगत सन्तुलन सम्भव होता है। उसी प्रकार आर्थिक स्तर पर समाज-कल्याण, कीमत, आय का वितरण, उचित वेतन तथा जीवन-स्तर सम्बन्धी मूल्य होते हैं, सामाजिक स्तर पर सामाजिक संगठन व व्यवस्था सम्बन्धी मूल्य, राजनीतिक स्तर पर सत्ता समानता, स्वतन्त्रता, राजभक्ति व नागरिकता के मूल्य, वैधानिक स्तर पर न्याय, समानता, स्वतन्त्रता, सुरक्षा, अधिकर व व्यवस्था के मूल्य, शैक्षिक स्तर पर व्यक्तित्व-विकास, मानसिक, स्वास्थ्य चरित्र तथा जीवन-लक्ष्य विषयक मूल्य तथा नैतिक स्तर पर पारस्परिक आदान-प्रदान, सहयोग, सहानुभूति, न्याय एवं प्रेम के मूल्य समाज के विभिन्न पक्षों और समग्र रूप में पूरे समाज को सन्तुलित व व्यवस्थित करने में महत्त्पपूर्ण योगदान करते हैं।
मूल्यों के बिना समाज आदिकालीन बर्बर स्तर पर उतर आएगा। सुसंस्कृत समाज का प्रथम लक्षण उच्च व उत्तम प्रकार के मूल्य ही हैं। जहाँ तक व्यक्ति के जीवन मूल्यों के महत्त्व का प्रश्न है, समाजशास्त्रियों का विचार है कि मूल्य, मनुष्य के सामाजिक जीवन के अनुरूप स्थिर तथा सुसंगत तरीके से उसके आधारभूत आवेगों और इच्छाओं का संगठन व सन्तुष्टि करके, मनुष्य के उद्विकास एवं चुनाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य की स्वकेन्द्रित, तत्कालिक तथा अस्थिर आवश्यकताओं को एक स्थायी मानसिक समूहों या मूल्यों में रूपान्तरित किया जाता है जिसके बिना मनुष्य का जीवन, हाब्स के शब्दों में, ‘‘घिनावना, पशुवत एवं संक्षिप्त बन गया होता।’’ मूल्यों में आदेशसूचक और, अनिवार्यता के तत्त्व होते हैं जिन्हें कि समाज में प्रचलित नीतियों, प्रथाओं और नौतिक नियमों के कारण उत्तरोत्तर जल प्राप्त होता रहता है।
फलतः मूल्य व्यक्ति के व्यवहारों को नियन्त्रित एवं सही मार्ग की ओर निर्देशित करने में महत्त्वपूर्ण होते हैं। मूल्य व्यक्ति की सामाजिक विरासत का एक अंग होता है। इसीलिए मूल्यों की व्यवस्था मानव-आस्तित्व के विभिन्न स्तरों या आयामों में व्यक्ति के अनुकूलन की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण प्रोत्साहन प्रदान करती व मार्गदर्शन करती है। यह एक ओर मनुष्य के मानसिक तनावों व संघर्षों को सुलझाते हुए आन्तरिक प्रसंगति व सम्बद्धता को उत्पन्न करता है एवं दूसरी ओर आदर्श आयाम की ओर वैयक्तिक व सामूहिक दोनों ही जीवन की उन्नति को निर्देशित करता है।
मूल्य-व्यवस्था व्यक्तित्व की संरचना को परिभाषित तथा नियन्त्रित करती है और इसके बदले में व्यक्ति अपने आचरणों द्वारा मूल्यों की गुणात्मक परिशुद्धि व परिमार्जन करता है। व्यक्ति मूल्यों के इस आपसी सम्बन्ध के कारण ही मूल्यों में परिवर्तन, परिवर्धन तथा परिमार्जन होता रहता है। व्यक्ति, समाज और मूल्य में पाए जाने वाले पारस्परिक सम्बन्ध व प्रभाव को दर्शाने के लिए मुकर्जी ने इन्हें एक दीपक की बत्ती, तेल और ज्योति कहा है। स्पष्ट है कि तेल (समाज) के बिना बत्ती (व्यक्ति) अधूरी है, और ज्योति (मूल्यों) के बिना बत्ती (व्यक्ति) और तेल (समाज) दोनों ही अर्थहीन हैं। अर्थात् अन्तिम रूप में मूल्य ही समाज और व्यक्ति के जीवन में ज्योति जलाता है। मुकर्जी के सुन्दर शब्दों में, ‘‘मनुष्य और समाज-तैरती हुई बत्ती और गहरे तेल के बीच चलने वाल अनन्त आदान-प्रदान से मूल्य-अनुभव की उजली, स्थिर ज्योति पनपती है जोकि हमारे नीरस और निरानन्द विश्व को निरन्तर प्रकाश और ताप देती रहती है।’’
स्वतंत्रता के पश्चात् निर्मित संविधान एवं समय-समय पर गठित शिक्षा सम्बन्धी आयोगों तथा समितियों का नैतिक मूल्य व नागरिक बोध सम्बन्धित शिक्षा को महत्त्वपूर्ण बताया है। हमारे संविधान में सर्व-धर्म समभाव को प्राथमिकता देकर नैतिक मूल्यों के रूप में सामने लाया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा आयोग-1964-65 ने इस विषय को महत्त्वपूर्ण कहते हुए शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य नैतिक व अध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा को बताया है। आयोग का मानना है कि धर्म एक महान प्रेरक शक्ति है, नैतिक मूल्यों के आकलन का एवं चरित्र निर्माण का वही आधार है। अतः महान धर्मों की नैतिक शिक्षा के द्वारा सामाजिक, नैतिक एवं अध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा देने का प्रयास किया जाना चाहिए।
डा. राधाकृष्णन ने ठीक कहा है कि भारत सहित सारे संसार के कष्टों का कारण यह है कि शिक्षा का सम्बन्ध नैतिक और अध्यात्मिक मूल्यों की प्राप्ति न रहकर केवल मस्तिष्क रह गया है, यदि शिक्षण का अर्थ हृदय और आत्मा की अवहेलना है तो उसको पूर्ण नहीं माना जा सकता है। 12 सितंबर 2002 के अपने ऐतिहासिक निर्णय में उच्चमत न्यायालय की त्रि-सदस्य खंडपीठ ने कहा कि सदाचार, सत्य, अहिंसा ये शास्वत मूल्य हैं जो कि मूल्य आधारित शिक्षा की नींव है। अतः इसके लिए यह जरूरी है कि यह जाना जाए कि हमारे उपनिषदों के उन तथ्यों को उसी रूप में समझा जाए। निर्णय में संविधान के अनुच्छेद 28 की व्याख्या करते हुए कहा कि विद्यार्थियों को मूल्य आधारित शिक्षा के तहत यह बताया जाए कि सभी का मूल एक है। सत्य, प्रेम, शांति, सदाचरण शास्वत, मूल्य सिक्षा के आधार होना चाहिए क्योंकि इन नैतिक मूल्यों के बिना कोई भी संविधान या लोकतन्त्र कारगर नहीं हो सकता।
आज भारत की नैतिक और मूलभावना भारत, आदर्श भारत तथा भ्रष्टाचार मुक्त भारत की तस्वीर की परिकल्पना साकार करना है तो नीचे से ऊपर तक अमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है और जितनी जल्दी से यह रिशफिलिंग की जाएगी सार्थक और आपेक्षित परिणाम नजर आने लगेंगे। हमें ऐसी राजनीतिक रणनीतियाँ अपनाने के प्रलोभन से बचने की जरूरत है जो रणनीतियाँ हमें विभाजित करतीं हों और नागरिकों के इस या उस वर्ग की पहचान तथा निष्ठा पर सवाल उठातीं हों। नेतृत्व का कार्य नागरिकों के मध्य पारस्परिक विश्वास और समन्वयपूर्ण एकजुटता का निर्माण करना है। ऐसा केवल ऐसे नेतृत्व द्वारा ही किया जा सकता है जिसके पास नैतिक शक्ति हो। अपने नेताओं को उनकी नैतिक आचरणगत दायित्यों के प्रति जागरूक करने के लिए आवश्यकता है कि लोकतान्त्रिक जीवंतता को जगाया जाए। यदि समाज अपने अस्तित्व को बनाए रखना चाहता है तो उसके लिए यह आवश्यक है कि वह व्यक्तित्व के परम या सर्वोच्य मूल्यों की नियमित रूप से पूर्ति करता रहे। व्यक्तित्व की सर्वोत्तम खोज सुन्दरता, अच्छाई तथा प्रेम के उच्चतम आध्यात्मिक मूल्य हैं। इसी सुन्दरता, अच्छाई तथा प्रेम के आधार पर सामाजिक सम्बन्धों व संस्थाओं की सृष्टि और पुनःसृष्टि होती है। सम्पूर्ण मानव-समाज के मानव-कल्याण के लिए इन मूल्यों का संरक्षण आवश्यक है
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