Wednesday, December 28, 2022

श्री मद्भागवत गीता में मैनेजमेंट के 11 सूत्र

 रीमद्भागवत गीता में मैनेजमेंट के 11 सूत्र

विश्व में श्री कृष्ण एवं अर्जुन के मध्य संवाद के रूप में जानी जाने वाली श्रीमद्भागवत गीता मैनेजमेंट के लिए विशेष रुप से जानी जाती है। श्रीमद्भागवत गीता के कई श्लोक में आत्म नियंत्रण, आत्म संयम, बुद्धि के इस्तेमाल से लेकर एकाग्रता किस प्रकार हासिल करके आगे बढ़ा जा सकता है, यह बताया गया है। श्रीमद भगवत गीता के श्लोकों को जीवन में उतारने से निश्चित तौर पर सफलता प्राप्त होगी भगवत गीता में प्रमुख रूप से मैनेजमेंट के जो सूत्र दिए गए हैं। इनमें से 11 सूत्र इस प्रकार हैं।

पहला सूत्र

त्रिविध नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:।

काम: क्रोधस्तथा लोभस्तरमादेतत्त्रयं त्यजेत।।

इस श्लोक का सामान्य अर्थ है कि काम, क्रोध और लोभ यह तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले हैं, अर्थात अधोगति में ले जाने वाले हैं, इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

मैनेजमेंट सूत्र :काम यानी इच्छाएं गुस्सा व लालच सभी बुराइयों के मूल कारण है। इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने इन्हें नर्क का द्वार कहा है। जिस भी मनुष्य में यह तीनों गुण होते हैं वह हमेशा दूसरों को दुख पहुंचा कर अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगा रहता है। अगर हम किसी लक्ष्य को पाना चाहते हैं तो यह 3 अवगुण हमें हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए, क्योंकि जब तक यह अवगुण हमारे मन में रहेंगे हमारा मन अपने लक्ष्य से भटकता रहेगा।

 दूसरा सूत्र

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत तत्पर:।

वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठा।।

इस श्लोक का सामान्य अर्थ है कि मनुष्य को चाहिए कि वह संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके समाहित चित हुआ मेरे परायण स्थित होवें, क्योंकि जिस पुरुष की इंद्रियां वश में होती है, उसकी ही बुद्धि स्थिर होती है।

मैनेजमेंट सूत्र :-जीभ, त्वचा, आंखें, कान, नाक आदि मनुष्य की इंद्रियां कही गई है। इन्हीं के माध्यम से मनुष्य विभिन्न सांसारिक सुखों का भोग करता है। जैसे जीभ अलग-अलग स्वाद चखकर सुख की अनुभूति करती है। सुंदर दृश्य देखकर आंखों को अच्छा लगता है। श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो मनुष्य अपनी इंद्रियों पर काबू रखता है। उसी की बुद्धि स्थिर होती है। जिसकी बुद्धि स्थिर होती है, वहीं अपने क्षेत्र में ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है और जीवन के कर्तव्यों का निर्वहन पूरी ईमानदारी से करता है।

तीसरा सूत्र

योगस्थ कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय।

सिद्धय सिद्धयों समों भूत्वा समत्व योग उच्यते।।

अर्जुन को श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म न करने का आग्रह त्याग कर यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योग युक्त होकर कर्म कर। क्योंकि समत्व को ही योग कहते हैं।

मैनेजमेंट सूत्र :-धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य कर्म करना। धर्म के नाम पर हम अक्सर सिर्फ कर्मकांड, पूजा-पाठ, तीर्थ मंदिरों तक सीमित रह जाते हैं। जबकि हमारे ग्रंथों में कहा गया है कि कर्तव्य को ही धर्म कहा जाए। भगवान कहते हैं कि अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी यश-अपयश और हानि-लाभ का विचार नहीं करना चाहिए। बुद्धि को सिर्फ अपने कर्तव्य यानी धर्म पर टिका कर काम करना चाहिए। इससे परिणाम बेहतर मिलेंगे और मन में शांति का वास होगा। मन में शांति होगी तो परमात्मा से आपका योग आसानी से होगा। आज का युवा अपने कर्तव्यों में फायदे और नुकसान का नाप तोल पहले करता है फिर उस कर्तव्य को पूरा करने के बारे में सोचता है, उस काम से तात्कालिक नुकसान देखकर कई बार उसे त्याग देता है और बाद में उससे ज्यादा हानि उठाता है जबकि शुरुआत में ही अगर सब कुछ तय करके लक्ष्य के प्रति ध्यान एकाग्र करके कर्म किया जाए तो उसमें निश्चित तौर पर सफलता मिलती है।

 चौथा सूत्र

नास्तिरबुद्धिर युक्तस्त्य से चायुक्तस्य भावना।

न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।।

अर्थ :-योग रहित पुरुष में निश्चय करने की बुद्धि नहीं होती और उसके मन में भावना भी नहीं होती। ऐसे भावना रहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं मिली, उसे सुख कहां से मिलेगा।

मैनेजमेंट सूत्र :- हर मनुष्य की इच्छा होती है कि उसे सुख प्राप्त हो, इसके लिए वह भटकता रहता है। लेकिन सुख का मुल तो उसके अपने मन में स्थिर होता है। जिस मनुष्य का मन, इंद्रियां धन, वासना, आलस्य आदि में लिप्त है उसके मन में आत्मज्ञान नहीं होता और जिस मनुष्य के मन में आत्मज्ञान नहीं होता उसे किसी भी प्रकार से शांति नहीं मिलती और जिसके मन में शांति ना हो उसे सुख कहां से प्राप्त होगा। अतः सुख प्राप्त करने के लिए मन पर नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है। मन के नियंत्रण की शुरुआत इंद्रियों से होती है, अर्थात इंद्रियां संयमित होना चाहिए।

पांचवा सूत्र

विहाय कामान य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:।

निर्ममों निरंहकार स शांतिमधिगच्छति।।

जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्य का पालन करता है उसे ही शांति होती है।

मैनेजमेंट सूत्र :-यहां भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर कर्म करने से मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा हम जो भी कर्म करते हैं उसके साथ अपने अपेक्षित परिणाम की इच्छा हमें कमजोर कर देती है। यह इच्छा पूरी नहीं होती है तो व्यक्ति का मन और ज्यादा अशांत हो जाता है। इसलिए मनुष्य को मन से ममता अथवा अहंकार आदि भाव को मिटाकर तन्मयता से अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी।

छठा सूत्र

न हीं कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत। 

कार्यते प्रश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणे।।

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि क्षण भर के लिए भी कर्म किए बिना कोई भी मनुष्य नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन होकर प्रकृति के अनुसार कर्म करते हैं। प्रकृति ही उनसे कर्म करवाती है और प्रकृति ही उनके परिणाम भी देती है।

मैनेजमेंट सूत्र :-कोई भी मनुष्य क्षण भर के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता इसलिए जितना हो सके उतना अच्छा कर्म करना चाहिए।

सातवा सूत्र

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायोस्कर्मण: 

शरीर यात्राणि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:

अर्थ- तू शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं होगा।

मैनेजमेंट सूत्र :-श्री कृष्ण अर्जुन के माध्यम से सभी मनुष्य को समझाते हैं कि हर मनुष्य को अपने अपने धर्म के अनुसार कर्म करते रहना चाहिए। जैसे विद्यार्थी का धर्म है विद्या का अध्ययन करना, सैनिक का धर्म है देश की रक्षा करना। जो लोग कर्म नहीं करते उनसे श्रेष्ठ वह लोग होते हैं जो अपने धर्म के अनुसार कर्म करते रहते हैं, क्योंकि बिना कर्म किए तो शरीर का पालन पोषण करना भी संभव नहीं है।

आठवां सूत्र

जद्यादाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेंवेतरो जन:।

स यत्प्रृमाणं कुरूते लोकस्तदनुवर्तते।।

श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं सामान्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं श्रेष्ठ पुरुष जिस कर्म को करता है उसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं।

मैनेजमेंट सूत्र :- यहां भगवान श्री कृष्ण ने बताया कि श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद की गरिमा के अनुसार व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वह जिस प्रकार का व्यवहार करेगा सामान्य मनुष्य भी उसी प्रकार का व्यवहार करेगा।

नवमा सूत्र

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म संगिनाम। 

जोष्येत्सर्वकर्माणि विद्वानयुक्त: समाचरन।।

मैनेजमेंट सूत्र :-ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले ज्ञानियों को बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न ना करें। किंतु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित होकर सब कर्मों को अच्छी प्रकार से करता हुआ उनसे भी वैसे ही कर्म करवाएं।

दसवा सूत्र

ये यथा मां प्रपद्यंते तास्तथैव भजाम्यहम 

मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।।

हे अर्जुन जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भरता है या निजी शिक्षा से मेरा स्मरण करता है उसी के अनुरूप अनुरूप में उसे फल प्रदान करता हूं सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

मैनेजमेंट सूत्र :- इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है उसे इसी प्रकार का व्यवहार अपने साथ प्राप्त होता है। मतलब हम सामने वाले के प्रति जिस प्रकार का व्यवहार करेंगे वैसा ही व्यवहार हमें प्राप्त होगा, यदि हम अच्छा करते रहेंगे तो अच्छा ही मिलेगा।

ग्यारहवां सूत्र

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। 

मां कर्मफल हेतु भूर्वा ते संगोस्वकर्मणि।।

भगवान श्री कृष्णा अर्जुन से कहते हैं कि अर्जुन कर्म करने में तेरा अधिकार है उसके फलों के प्रति तू हेतु मत हो और कर्म ना करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।

मैनेजमेंट सूत्र :- भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा के साथ वह कर्म नहीं कर पाएंगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकर अपना काम करते रहो। फल देना ना देना व कितना देना यह सभी बातें परमात्मा पर निर्भर करती है।

 

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