भारतीय उद्योग जगत में यूं तो कई शख्सियत ऐसी हैं जो कमाई, नेटवर्थ या दूसरे कारणों से जानी जाती हैं पर यहां हम एक ऐसे शख्स के बारे में बता रहे हैं जो दानवीरता के मामले में हिमालय से ऊंचे नजर आते हैं.
प्रेमजी का जीवन है सादगी और ईमानदारी से भरा
भारतीय बिजनेसमैन प्रेमजी बहुत ही सामान्य जीवन जीने में विश्वास करते हैं। जब वह कंपनी के काम से बाहर जाते हैं तो हमेशा ऑफिस गेस्ट हाउस में ही रुकते हैं। वे देश में यात्रा के दौरान इकोनॉमी क्लास में सफर करते हैं। एयरपोर्ट आने-जाने के लिए अपनी कार या टैक्सी की बजाय ऑटो से भी चले जाते हैं।
भारत की GDP को मजबूत बनाने में सेवा क्षेत्र का 53% योगदान है। ऐसे में सेवा क्षेत्र के महत्वपूर्ण व्यक्तियों का इसमें अहम किरदार है जिनमें रतन टाटा, बिड़ला ग्रुप तथा अज़ीम प्रेमजी का नाम शुमार है, जिसमे ज़रूरतमंदों के लिए अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन चर्चा जोरों है।
बात करते है अज़ीम प्रेमजी के शुरुआती दिनों के बारे में तो इनका जन्म 24 जुलाई 1945 मुंबई के बहुत ही समृद्ध परिवार में हुआ था। इनकी स्कूली पढ़ाई सेंट मैरी से हुई और कालेज अमेरिका से स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी जहाँ से वह मैकीनिक्ल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे।
इनके पिताजी मोहम्मद हाशिम प्रेमजी ने “वेस्टर्न इंडियन वेजिटेबल प्रोडक्ट ऑर्गनाइज़ेशन” यानी WIPRO की स्थापना की। तब यह कम्पनी साबुन, तेल तथा अन्य वस्तु बेचा करती थी। वहीं इनकी माताजी एक डॉक्टर हैं और कैंसर पीड़ितों का इलाज करती हैं तथा ज़रूरतमंदों के लिए मुफ्त इलाज की सुविधा भी देती हैं।
जब इनकी उम्र 21 वर्ष की थी तब इनके पिताजी का देहांत हो जाता है और वह तुरन्त अपनी पढ़ाई छोड़ अमेरिका से वापस भारत आ जाते हैं और अपने बिजनेस को सँभालते हैं। साथ ही 1999 में डिस्टेन्स लर्निंग के ज़रिये उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की।
मगर 1966 में उनके द्वारा बिजनेस को सँभालते ही वह विप्रो की दिशा ही बदल देते हैं जिसका नतीजा आज हम सभी के सामने है। वर्तमान में यह बिजनेस टाइकून, इन्वेस्टर तथा WIPRO कम्पनी के चेयरमैन हैं और इन्होंने लाखों लोगों को रोज़गार दिए हैं।
साथ ही कोरोना वायरस की महामारी के बीच 7,904 करोड़ रुपए दान दिए हैं यानी 22 करोड़ प्रतिदिन और हज़ारों लोगों को मौत के मुँह से बाहर निकाला है। इसके अलावा कम्पनी के मुनाफे में से 34% समाज सेवा में यह दान करते हैं। वहीं फोर्ब्स के मुताबिक भारत के यह दूसरे सबसे धनी व्यक्ति हैं।
साबुन, तेल, बेकरी इत्यादि जैसी वस्तुओं का उत्पादन विप्रो में होता था जो कि शानदार चल रहा था। मगर अज़ीम प्रेमजी जान गए थे कि अगर आईटी सेक्टर में विप्रो आ जाए तो उनकी कम्पनी और आगे जा सकती है और तब उन्होंने इस सेक्टर में हाथ आज़माया।
शुरुआत में अमेरिका की सेंटिनल कम्पनी के साथ मिलकर मिनी कम्प्यूटर बनाने की शुरुआत की और उसके बाद साफ्टवेयर भी बनाने लगे। उस वक्त विप्रो एक मात्र भारतीय कम्पनी थी जो “IT सेक्टर” में कार्य कर रही थी और 1990 में विप्रो कामयाबी के चरम पर थी और उस वक्त अज़ीम प्रेमजी काफी धनवान हो चुके थे।फिलहाल 67 देशों में विप्रों ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है और 35 बिलियन इसकी मार्केट कैपिटल है।
अजीम प्रेमजी का प्रारंभिक जीवन
भारतीय कारोबारी अजीम प्रेमजी का जन्म 24 जुलाई, 1945 को मुंबई के शिया मुस्लिम परिवार में हुआ। इनके परिवार का मूल निवास कच्छ (गुजरात) था। इनके पिता मुहम्मद हाशिम प्रेमजी प्रसिद्ध व्यवसायी थे और वह ‘राइस किंग ऑफ़ बर्मा’ के नाम से विख्यात थे। उनके पिता को विभाजन के समय जिन्ना ने पाकिस्तान आने का न्योता दिया था, पर उन्होंने इसे ठुकराते हुए भारत में ही रहने का निश्चय किया।
29 दिसंबर, 1945 को उनके पिता मुहम्मद प्रेमजी ने महाराष्ट्र के जलगांव जिले में ‘वेस्टर्न इंडियन वेजिटेबल प्रोडक्ट्स लिमिटेड’ की स्थापना की। यह कंपनी सनफ्लावर वनस्पति और कपड़े धोने के साबुन ‘787’ बनाने का कार्य करती थी। प्रेमजी जब अमेरिका के स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे, तब इसी बीच 11 अगस्त, 1966 को उनके पिता की मौत हो गई और उन्हें इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर भारत वापस आना पड़ा। इस समय उनकी उम्र मात्र 21 वर्ष की थी और उनके कंधों पर कंपनी की जिम्मेदारी आ गईं।
कैसे हुई अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन की शुरुआत?
अज़ीम प्रेमजी ने काफी धन कमा लिया जिसके चलते उन्होंने सोचा कि अब ज़रूरतमंदों की मदद करने का समय आ गया है और इसी वजह से अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन की स्थापना वर्ष 2001 में होती है। प्रेमजी का यह मानना है कि भारत में अभी भी एजुकेशन सिस्टम में बहुत सुधार की ज़रूरत है।
प्राइवेट स्कूल तो बेहतर कर रहे हैं पर वह अधिकतर शहर में ही हैं। ऐसे में 60% जनसँख्या जो कि गांव में रहती है उन बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों से सही पढ़ाई नहीं हो पा रही है जिससे हमारे एजुकेशन सिस्टम पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
यदि यहाँ भी सही ढंग से बच्चों को पढ़ाया जाए तो हिंदुस्तान का आने वाला कल बेहतरीन हो सकता है। इसी दिक्कत को देखते हुए वर्ष 2009 में एजुकेशन पर अज़ीम प्रेमजी ने “21 बिलियन डॉलर” लगा दिए ताकि भारत के बच्चों को पढ़ने की अच्छी सुविधा मिल सके।
फिलहाल अभी कुछ गाँव में स्कूल बनाने की प्रक्रिया चल रही है तो कुछ जगहों में बनकर तैयार है। प्रेमजी ने यह ठान लिया है कि हिंदुस्तान के एजुकेशन सिस्टम को सुधारना ही है ताकि भारत के बच्चों का भविष्य बेहतर हो सके।
प्रेमजी की शादी यास्मीन प्रेमजी के साथ हुई है तथा दो बेटे हैं और दोनों ही विप्रो में कार्यरत हैं। इनको 2005 में “पद्म भूषण” तथा 2011 में “पद्म विभूषण” पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।
इन सबके बीच हिंदुस्तान के बंटवारे के बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने प्रेमजी के पिताजी मोहम्मद हाशिम प्रेमजी को पाकिस्तान में आने तथा अपना बिजनेस यहीं स्थापित करने का प्रस्ताव दिया था।
जिसके जवाब में हाशिम प्रेमजी ने उनका प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा था कि पाकिस्तान भी तो भारत से निकला है और मैं हिंदुस्तान में रहकर ही अपने बिजनेस को आगे बढ़ाने का कार्य करूँगा।
वहीं एक इंटरव्यू के दौरान अज़ीम प्रेमजी ने अपनी सफलता का राज़ बताते हुए कहा था कि यदि अपने कारोबार को आगे बढ़ाना है तो अपने सभी कर्मचारियों के आइडिया लेना बेहद ज़रूरी है क्योंकि तभी कम्पनी में एकता की भावना जागेगी।
साथ ही यदि कोई व्यक्ति अपने बिजनेस में विफल होता है तो उसे हताश होने के बजाए वापस से दोबारा शुरुआत करनी चाहिए क्योंकि सफल होने के लिए असफलता एक साधन है। बहरहाल, वर्तमान में इनका सारा ध्यान समाज सेवा की ओर है। यही उम्मीद है कि प्रेमजी ने जो बदलाव की शुरुआत की है उसमें वह जल्द ही कामयाब होंगे।
Indian Business Tycoon Azim Premji: देश के सबसे बड़े परोपकारियों में से एक अजीम प्रेमजी को देशवासी एक आदर्श के रूप में मानते हैं. उनकी समाज के प्रति दरियादिली और सोसायटी के प्रति किए गए कामों की मिसाल खूब दी जाती है. मौजूदा समय में विप्रो के संस्थापक और फाउंडर अजीम प्रेमजी ने विप्रो की बागडोर अपने बेटे रिशद प्रेमजी को सौंप रखी है पर इस कंपनी को देश-विदेश में नाम कमाने का जो मौका मिला है वो अजीम प्रेमजी के नेतृत्व में ही मिला है. यहां हम बात कर रहे हैं भारत के ऐसे बिजनेस टायकून अजीम प्रेमजी की जो फिलॉन्थ्रॉपी या दानवीरता के मामले में आधुनिक जमाने के कर्ण कहे जा सकते हैं और इस लेख में हम उनके जीवन के इस आयाम के तहत कुछ जानकारी आपतक पहुंचाएंगे.
कोविड महामारी के लिए भी खुलकर दिया दान
बीते साल कोविड महामारी के कहर के बीच विप्रो (Wipro) लिमिटेड, विप्रो एंटरप्राइजेज लिमिटेड और अजीम प्रेमजी फाउंडेशन ने अभूतपूर्व स्वास्थ्य और मानवीय संकट से मुकाबला करने के लिए 1125 करोड़ रुपये दिए हैं. कोरोना महामारी से लड़ने के लिए जो एलान किया गया उसके तहत अजीम प्रेमजी फाउंडेशन 1,000 करोड़ रुपये, विप्रो लिमिटेड कंपनी 100 करोड़ रुपये, जबकि विप्रो एंटरप्राइजेज लिमिटेड 25 करोड़ रुपये और दे चुके हैं.
Indian Business Tycoon Azim Premji: देश के सबसे बड़े परोपकारियों में से एक अजीम प्रेमजी को देशवासी एक आदर्श के रूप में मानते हैं. उनकी समाज के प्रति दरियादिली और सोसायटी के प्रति किए गए कामों की मिसाल खूब दी जाती है. मौजूदा समय में विप्रो के संस्थापक और फाउंडर अजीम प्रेमजी ने विप्रो की बागडोर अपने बेटे रिशद प्रेमजी को सौंप रखी है पर इस कंपनी को देश-विदेश में नाम कमाने का जो मौका मिला है वो अजीम प्रेमजी के नेतृत्व में ही मिला है. यहां हम बात कर रहे हैं भारत के ऐसे बिजनेस टायकून अजीम प्रेमजी की जो फिलॉन्थ्रॉपी या दानवीरता के मामले में आधुनिक जमाने के कर्ण कहे जा सकते हैं और इस लेख में हम उनके जीवन के इस आयाम के तहत कुछ जानकारी आपतक पहुंचाएंगे.
कोविड महामारी के लिए भी खुलकर दिया दान
बीते साल कोविड महामारी के कहर के बीच विप्रो (Wipro) लिमिटेड, विप्रो एंटरप्राइजेज लिमिटेड और अजीम प्रेमजी फाउंडेशन ने अभूतपूर्व स्वास्थ्य और मानवीय संकट से मुकाबला करने के लिए 1125 करोड़ रुपये दिए हैं. कोरोना महामारी से लड़ने के लिए जो एलान किया गया उसके तहत अजीम प्रेमजी फाउंडेशन 1,000 करोड़ रुपये, विप्रो लिमिटेड कंपनी 100 करोड़ रुपये, जबकि विप्रो एंटरप्राइजेज लिमिटेड 25 करोड़ रुपये और दे चुके हैं.
अजीम प्रेमजी की दानवीरता की एक झलक
जैसा कि आप जानते हैं कि सीएसआर यानी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी के तहत बड़े कॉरपोरेट को एक निश्चित रकम सामाजिक कल्याण के लिए देनी होती है पर अजीम प्रेमजी ऐसे ख्स हैं जो इस नेक काज को तब से कर रहे हैं जब ऐसा करने की कोई बाध्यता नहीं थी. अजीम प्रेमजी करीब 1.45 लाख करोड़ रुपये के शेयर अजीम प्रेमजी फाउंडेशन को दे चुके है. पिछले 5 साल में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की तरफ से करीब 150 एनजीओ को आर्थिक मदद दी जा चुकी है और कोरोना से लड़ने के लिए भी उन्होंने कई तरह के दान कार्य किए.
आईटी सम्राट के रूप में कमाई बेशुमार लोकप्रियता
अजीम प्रेमजी को अनौपचारिक रूप से भारतीय आईटी उद्योग के सम्राट के रूप में जाना जाता रहा और परोपकार के मामले में उनकी पहचान विश्व प्रसिद्ध है. अजीम प्रेमजी देश की आईटी कंपनियों में विप्रो को अग्रणी स्थान दिलाने वाले मशहूर बिजनेसमैन ही नहीं बल्कि परोपकार के मामले में देश में सबसे आगे रहने वाले उद्योगपति भी हैं.
प्रेमजी का शुरुआती जीवन
अजीम प्रेमजी का जन्म 24 जुलाई 1945 को मुंबई में हुआ था और उनका पूरा नाम अजीम हाशिम प्रेमजी है. उनके पिता हाशिम प्रेमजी एक नामी बिजनेसमैन थे जिन्हें बर्मा के चावल किंग के तौर पर जाना जाता था. भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय जिन्ना ने उनके पिता हाशिम प्रेमजी से पाकिस्तान चलने को कहा पर हाशिम प्रेमजी ने भारत में ही रहना पसंद किया. ये भी बताया जाता है कि अजीम प्रेमजी के पिता के पास पाकिस्तान का पहला वित्त मंत्री बनने का अवसर था पर उन्होंने भारत में ही रहना पसंद किया और यहीं अपने कारोबार को बढ़ाने का निर्णय लिया.
इंजीनियर की डिग्री के मालिक प्रेमजी बने उद्योग जगत के शहंशाह
अजीम प्रेमजी के पास अमेरिका के कैलोफोर्निया की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बैचलर ऑफ साइंस की डिग्री है जो इंजीनियरिंग की ग्रेजुएट डिग्री के बराबर मानी जाती है. अगस्त 1966 में उन्हें अपने पिता की मृत्यु के बाद भारत वापस आना पड़ा. उस समय उनकी उम्र 21 वर्ष थी लेकिन उन्होंने पिता की छोड़ी विरासत को इस तरह बढ़ाया कि वो उद्योग जगत के लिए एक मिसाल बन गई.
विप्रो को कैसे बनाया, कैसे बढ़ाया- यहां जानें
विप्रो शुरुआत में साबुन और वेजिटेबिल ऑयल के कारोबार में थी पर 1970 के दशक में अजीम प्रेमजी ने अमेरिकन कंपनी सेंटिनल कंप्यूटर कॉर्पोरेशन के साथ हाथ मिलाया और उसके बाद विप्रो ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. अजीम प्रेमजी ने 1980 में विप्रो को आईटी कंपनी के तौर पर इंट्रोड्यूस कराया और कंपनी पर्सनल कंप्यूटर बनाने के साथ सॉफ्टवेयर सर्विसेज भी प्रोवाइड कराने लगी. इसके बाद ही कंपनी का नाम बदलकर विप्रो (WIPRO) किया गया था.
आईटी कंपनी विप्रो के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर अजीम प्रेमजी 30 जुलाई 2019 को रिटायर हो चुके हैं पर वो अपनी छाप इस तरह छोड़ चुके हैं कि उनकी कंपनी और उनसे जुड़े लोग उन्हें एक शानदार व्यक्तित्व के रूप में ही जानते हैं.
अजीम प्रेमजी को मिले हुए सम्मान
अजीम प्रेमजी को साल 2005 में भारत सरकार ने व्यापार और वाणिज्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया था और साल 2011 में उन्हें पद्म विभूषण प्रदान किया गया जो भारत सरकार का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है. साल 2010 में वो एशियावीक द्वारा दुनिया के 20 सबसे शक्तिशाली पुरुषों में से एक चुने गए थे. वो दो बार यानी साल 2004 और 2011 में टाइम मैगजीन के दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल रहे हैं. वर्ष 2000 में, उन्हें मणिपाल अकादमी ऑफ हायर एजुकेशन द्वारा मानद डॉक्टरेट दिया गया. साल 2006 में, अजीम प्रेमजी को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग, मुंबई द्वारा लक्ष्मी बिजनेस विजनरी से सम्मानित किया गया था. साल 2009 में, उन्हें अपने उत्कृष्ट परोपकारी काम के लिए मिडलटाउन, कनेक्टिकट में वेस्लेयन विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया गया था. साल 2013 में, उन्हें ईटी लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला और इसके अलावा साल 2015 में, मैसूर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट प्रदान किया, वहीं अप्रैल 2017 में, इंडिया टुडे पत्रिका ने उन्हें साल 2017 के भारत के 50 सबसे शक्तिशाली लोगों की लिस्ट में 9 वां स्थान दिया था.
कई मानद उपाधियों से किए जा चुके हैं सम्मानित
वर्ष 2000 में मणिपाल अकादमी ने उन्हें डॉक्टरेट
की मानद उपाधि से सम्मानित किया।
वर्ष 2006 में राष्ट्रीय औद्योगिक इंजीनियरिंग
संस्थान, मुंबई, द्वारा उन्हें लक्ष्य बिज़नेस विजनरी से
सम्मानित किया गया।
वर्ष 2009 में उन्हें कनेक्टिकट स्थित मिडलटाउन के
वेस्लेयान विश्वविद्यलाय द्वारा उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए
डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया।
सन 2015 में मैसोर विश्वविद्यालय ने उन्हें
डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया।
प्रेमजी को मिले पुरस्कार
अजीम प्रेमजी के बिजनेस और समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यों को सम्मानित करने के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2005 में ‘पद्म भूषण’ पुरस्कार से नवाजा।
वर्ष 2013 में उन्हें फिर एक बार देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया।
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