Wednesday, December 28, 2022

निर्णय लेने में समग्र दृष्टिकोण

निर्णयन का अर्थ एवं परिभाषा

निर्णय प्रक्रिया के विभिन्न चरण

प्रशासन में निर्णय प्रक्रिया : संगठन का आधुनिक सिद्धान्त जिन राजनीतिशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक विश्लेषणात्मक पहलुओं पर बल देता है, उनका एक सहज परिणाम यह निकला है कि संगठन अध्ययन के क्षेत्र में केन्द्रीय पहलू पदसोपान न रहकर नेतृत्व एवं निर्णय प्रक्रिया बन चुके हैं। साइमन तथा उसके साथियों द्वारा आरम्भ किया जाने वाला यह प्रयास अब जोसेफ कुयर हार्डविक, लैण्डयुर, गोरे तथा डेसन आदि कितने ही प्रशासकीय शोधकर्ताओं के वैज्ञनिक परीक्षणों के आधार पर इतना आगे बढ़ चुका है कि यह एक स्वतन्त्र उपागम, वाद या विचारधारा का रूप ले चुका है।

लोक प्रशासन के निर्णयपरक दृष्टिकोण की प्रमुख मान्यताएँ

लोक प्रशासन के निर्णयपरक दृष्टिकोण की प्रमुख मान्यताओं के वर्णन निम्नांकित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है-

1. प्रशासन अथवा संगठन निर्माण के लिये कुछ मानसिक निर्णयों की पूर्व आवश्यकता कोई भी प्रशासन अथवा संगठन किन्हीं कार्य विशेषों को सम्पादित करने के लिए बनाया जाता है और उन सभी मानवीय कार्यों को भौतिक रूप से सम्पन्न किये जाने के लिए कुछ मासिक निर्णयों की पूर्व आवश्यकता होती है। दूसरे शब्दों में, पहले एक निर्णय प्रक्रिया आरम्भ होती है और जहाँ जिस क्षण वह रुक जाती है वहीं पर कार्य सम्बन्धी निर्णय जन्म लेता है। प्रशासन की सभी क्रिया-प्रतिक्रियाएँ इन्हीं निर्णयों एवं उपनिर्णयों से बँधी होती हैं।

2. निर्णय प्रक्रिया प्रशासकीय संगठन का केन्द्र है- इस दृष्टिकोण की मान्यता है। कि निर्णय प्रक्रिया प्रशासकीय संगठन का केन्द्र अथवा हृदय है। प्रत्येक संगठन में यह निर्णयकर्त्ता केन्द्रएक निर्णायक भूमिका अदा करता है और संगठन के अन्य सभी अंग-प्रत्यंग इसका अनुपालन मात्र करते हैं।

3. प्रशासन अथवा संगठन में यदि उच्च स्तरों पर नीति निर्माण कार्य चलता है तो वह एक सैद्धान्तिक, जटिल एवं व्यापक निर्णय होता है जिससे राजनीति एवं प्रशासनिक प्रक्रियाएँ आपस में अन्तर्बद्ध एवं अन्तर्प्रविष्ट होती रहती हैं।

निर्णयन का अर्थ एवं परिभाषा

निर्णयन से आशय निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करने से है। निर्णय करते समय प्रशासन के सामने एक से अधिक विकल्प होते हैं। निर्णय प्रायः नीति, नियम, आदेश अथवा निर्देश के रूप में व्यक्त होते हैं।

डॉ. जे.सी. ग्लोवर के मत में, “चुने हुए विकल्पों में से किसी एक के सम्बन्ध में निर्णय करना ही निर्णयन है।

संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि जटिलतम तथा परस्पर, गँथी हुई परिस्थितियों के अन्तर्गत उपलब्ध कई विकल्पों में से संगठन की क्षमतानुसार एक श्रेष्ठ विकल्प को चुनने तथा उसे प्रभावी ढंग से कार्यरूप प्रदान करने को ही निर्णयनके नाम से पुकारा जाता है।

निर्णय प्रक्रिया के विभिन्न चरण

1. समस्या को पहचानना, समझना और स्वीकारना- निर्णय प्रक्रिया का पहला चरण समस्या को पहचानना, समझना तथा स्वीकार करना है। इसका दूसरा अर्थ यह हुआ कि समस्या और समस्याहीनता की स्थिति में अन्तर करना। प्रशासन में यह एक बड़ी दुविधा होती है कि किसे समस्या माना जाय और किसे सामान्यता। समस्या को पहचानना और स्वीकार करना अपने आप में अनेक प्रश्नों को जन्म देता है, जैसे-(i) यह समस्या लगती है अथवा है? (2) क्या समस्या स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है अथवा अन्य समस्याओं से उलझी हुई है? (3) क्या समस्या को देखते समय निर्णयकर्ता अपनी समस्याएँ तो उसमें नहीं डाल रहा है? (4) क्या समस्या को देखते समय इस बात का ध्यान रखा गया है कि संगठन के किस स्तर पर समस्या को देखा अथवा समझा जाना चाहिए?

2. समस्या के इतिहास को पहचानना- प्रथम चरण का दूसरा उपचरण समस्या के इतिहास को पहचानना है। ऐसी कितनी ही समस्याएँ होती हैं जो पूर्व निर्णयों और निष्कर्षों से जन्म लेती हैं। समस्या का इतिहास स्थितियों से पूर्ण अनुभव तथा स्थिति का निरन्तर विकास एवं बदली हुई स्थिति को समझने में सहायता करता है। यह सच है कि ऐतिहासिक ज्ञान किसी भी प्रशासनिक समस्या की नवीनता एवं अद्भुतता का परिचय नहीं देता किन्तु समस्या के इतिहास से परिचित निर्णयकर्त्ता एक विशेष लाभदायक स्थिति में रहता है, जहाँ से वह पुरानी और नयी स्थितियों की तुलना द्वारा समस्या की गम्भीरता, जटिलता एवं अन्तः निर्भरताओं को सरलता से समझ सकता है।

3. समस्या से उत्पन्न स्थिति का सर्वेक्षण करना- यह सर्वेक्षण निर्णयकर्ता को इस दृष्टि से सहायता देता है कि वह यह समझ सके कि स्थिति किस प्रकार की है। समस्या स्पष्ट रूप से क्या चेतावनी देती है? समस्या में कौन-कौन सी नयी और अद्भुत बातें हैं? समस्या का संगठनात्मक प्रभाव किन-किन बातों पर और कितना गहरा होगा ? इत्यादि ।

4. समस्या की भावी दिशाओं तथा नये क्षितिजों का अन्वेषण- प्रथम चरण का चतुर्थ उपचरण समस्या की भावी दिशाओं तथा नये क्षितिजों का अन्वेषण है। ऐसा करते समय निर्णयकर्त्ता स्थिति का विश्लेषण करने का प्रयास करता है और उसमें स्वयं सक्रिय भाग लेने लगता है। कल्पित तथ्यों और मूल्यों की अपनी तस्वीर से बस यह पहचानने का प्रयास करता है कि संगठन के उद्देश्य इस निर्णय के कितने उत्प्रेरक हैं अथवा रहेंगे। कौन-कौन सी क्रिया प्रतिक्रियाएँ बिन्दुओं को जन्म देंगी? क्या निर्णय आगे की निर्णय प्रक्रिया को गम्भीर मोड़ दे सकेगा? निर्णय की अनुपालना किस स्तर पर होगी और कौन-कौन से व्यक्ति अमुक निर्णय से किस सीमा तक प्रभावित होंगे?

5. तथ्यों का मूल्यांकन- दूसरे चरण का द्वितीय उपचरण तथ्यों का मूल्यांकन करना है। एक तथ्य, तथ्य होता है। यह कथन इसलिए सही नहीं है कि देखने वालों की मानसिक दृष्टि विकल्पों को एक ही प्रकार से नहीं देखती। तथ्यों का मूल्यांकन करते समय किसी भी निर्णयकर्त्ता के लिए यह आवश्यक है कि तथ्य संग्रह की सारी विशेष सतर्कताएँ बरतने के बाद वह अपने तथ्यों को निम्न प्रश्नों के सन्दर्भ में देखे और जाँचें।

6. निर्णय प्रक्रिया का तीसरा और अन्तिम चरण है, विकल्पों का चयन । यद्यपि प्रत्येक संगठन और प्रत्येक निर्णयकर्त्ता के साथ इस चयन की कसौटी में कुछ-न-कुछ परिवर्तन होना अनिवार्य है, किन्तु प्रशासन के सामान्य सिद्धान्तों के आधार पर यह सम्भव है कि चयन का एक मापक यन्त्र निश्चित किया जा सकता है।

हर्बर्ट साइमन के निर्णयन प्रक्रिया

साइमन के लिए प्रशासनकार्य करानेकी कला है। उन्होंने उन प्रक्रियाओं तथा विधियों पर बल दिया, जिनसे कार्यवाही सुनिश्चित हो। वह कहते हैं कि प्रशासनिक विश्लेषण मे उस चयन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है जो कार्यवाही से पहले किया जाना है। निर्णय लेना चयन की वह प्रक्रिया है जिस पर कार्यवाही आधारित होती है। साइमन ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि इस आयाम को भली प्रकार समझने के अभाव में प्रशासन का अध्ययन अधिकांश रूप में अपर्याप्त रहेगा, क्योंकि यही संगठन में व्यक्ति के व्यवहार को सुस्थित करता है। व्यवहारवादी उपागम में कार्यवाही से पूर्व की प्रक्रिया को समझने का प्रयास किया जाता है, इसे निर्णय लेने की प्रक्रिया के नाम से जाना जाता है। साइमन ने इस बात पर बल दिया है कि निर्णय से अभिप्राय तथ्योंएवं मूल्यतत्त्वों का उचित योग होता है। तथ्यसे अभिप्राय है कि कोई वस्तु क्या है, क्या थी अथवा क्या रही है। तथ्य सच्चाई की अभिव्यक्ति है। इसके विपरीत, ‘मूल्यसे तात्पर्य पसन्दगी से है। मूल्य वरीयता की अभिव्यक्ति होती है, इसलिए यह तथ्य पर आधारित नहीं होती। साइमन के अनुसार प्रत्येक निर्णय अनेक तथ्यों और एक या अनेक मूल्य वक्तव्यों का परिणाम होता है। विकल्प या निर्णय में तथ्य तथा मूल्य दोनों शामिल होते हैं। ये किसी निर्णय में सम्मिलित नैतिक एवं तथ्यपरक तत्वों के विश्लेषण की कसौटियों को स्पष्ट करते हैं। साइमन ने उदाहरण दिया है कि मानो एक सेनापति आक्रमण की पद्धति के बारे में निर्णय करना चाहता है। वह इस मूल्य वक्तव्य से शुरू करता है, ‘मुझे आक्रमण करना चाहिए।यह मूल्यवक्तव्य है। इसके विपरीत तथ्य वक्तव्य हैं अचानक आक्रमण ही सफल होता है। यह तथ्य अनेक पूर्व अनुभवों पर आधारित हैं। इस तथ्यंएवं मूल्यसम्बन्धी कथनों को संयुक्त करने पर निर्णयसम्भव होता है। इस प्रकार हर निर्णय तथ्य कथनोंएवंमूल्य कथनोंके संयोग का परिणाम है।

साइमन के अनुसार निर्णय लेने की आवश्यकता उस समय उत्पन्न होती है जब व्यक्ति के पास किसी कार्य को करने के लिए बहुत से विकल्प होते हैं, परन्तु व्यक्ति को छँटनी की प्रक्रिया के माध्यम से केवल एक ही विकल्प चुनना होता है।

साइमन का मत है कि निर्णयका अर्थ विभिन्न विकल्पों में से चुनाव करना है। जब कोई समस्या सामने होती है, तो उसके विभिन्न विकल्प होते हैं। निर्णयकर्त्ता को अधिकतम लाभ या  वांछित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उनमें से चयन करना पड़ता है। मानव की बुद्धिमत्ता इसमें है कि वह ऐसे विकल्प का चुनाव करे जिससे अधिकतम सकारात्मक तथा न्यूनतम नकारात्मक परिणाम निकले। इस दृष्टि से साइमन ने निर्णय की प्रक्रिया को निम्न तीन चरणों में बाँटा है-

(i) अन्वेषण क्रियानिर्णयन के इस प्रारम्भिक चरण में यह पता किया जाता है कि कब और कहाँ निर्णय की आवश्यकता होती है। साथ ही, इनमें निर्णय की उपयुक्त दशाओं के लिए बाह्य एवं आन्तरिक वातावरण की खोज की जाती है। इसमें संगठन की आन्तरिक नीतियों, प्रबन्धकीय व्यवहार एवं चिन्तन, संगठनात्मक, लक्ष्यों, मूल्यों व दर्शन के साथ-साथ बाह्य सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक मूल्यों, सामाजिक प्रारूपों, अभिवृत्तियों आदि का विस्तृत अध्ययन किया जाता है।

(ii) डिजाइन क्रिया- इस चरण में विभिन्न सम्भावित क्रियाविधियों का विकास एवं विश्लेषण किया जाता है। कार्य के विभिन्न विकल्पों की खोज की जाती है।

(iii) चयन क्रियानिर्णयन प्रक्रिया के तीसरे अन्तिम चरण में समस्त उपलब्ध क्रियाविधियों में से श्रेष्ठ क्रियाविधि का चयन किया जाता है। यह चयन विभिन्न विकल्पों की पारस्परिक तुलना एवं विश्लेषण के आधार पर किया जाता है।

साइमन अनुसार निर्णय निर्माण तार्किक (विवेकशीलता) चयन पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने तार्किकता की परिभाषा देते हुए कहा है कि यह मूल्यों की किसी प्रणाली के सन्दर्भ में वरीयता प्राप्त व्यवहार विकल्पों का ऐसा सम्बन्ध है जिसके द्वारा व्यवहार के परिणामों का मूल्यांकन किया जा सके। कोई निर्णय तभी औचित्यपूर्ण या तार्किक (rational) माना जाता है जबकि इसके लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उपयुक्त साधनों का चयन किया जाता है। साइमन लिखते हैं कि किसी भी प्रशासनिक निर्णय का सही होना एक सापेक्षिक बात है-यह तभी सही होता है जबकि यह अपने निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उपयुक्त साधनों का चुनाव करता है। साइमन पूर्ण तार्किकता की अवधारणा को नकारते हैं, क्योंकि यह अतार्किक मान्यताओं पर आधारित पूर्ण तार्किकता इस विश्वास पर आधारित है कि निर्णयकर्त्ता सर्वदर्शी है तथा उसे सभी प्राप्त विकल्पों तथा उनके परिणामों का ज्ञान है। दूसरे यह भी मान्यता है कि निर्णयकर्ता के पास असीमित कम्प्यूटरीय योग्यता है। अन्त में उसका विश्वास है कि निर्णयकर्ता में सभी सम्भावित परिणामों को एक व्यवस्था में रखने की क्षमता है। साइमन का कहना है कि ये सभी मान्यताएँ मौलिक रूप से गलत है। कौशलों, आदतों, मूल्यों तथा ध्येय की अवधारणा तथा अपने कार्य के संगत ज्ञान की सीमा के रूप में निर्णयकर्त्ता की अनेक सीमाएँ हैं। इसलिए साइमन का कहना है कि संगठन को पूर्ण तार्किकता की अवधारणा के साथ नहीं चलना चाहिए, बल्कि उसे सीमित तार्किकताके आधार पर कार्य करना चाहिए। साइमन के केवल मर्यादित विवेकशीलताके आधार पर ही कार्य करता है। साइमन प्रशासनिक व्यवहार में अनुसार व्यक्ति पूर्ण विवेकशीलता के विचार को नकारता है। उसके अनुसार मानवीय व्यवहार न तो पूर्ण विवेकशील (तार्किक) होता है और न ही पूर्ण गैर-विवेकशील (अतार्किक) होता है वरन् यह मर्यादित विवेकशीलहोता है। इसी सीमित तार्किकता के सन्दर्भ में साइमन तुष्टिकरण की अवधारणा विकसित करते हैं। तुष्टिकरण शब्द तुष्टितथा पर्याप्तताशब्दों से बना है। चूँकि पूर्ण तर्कसंगतता असम्भव है इसलिए कार्यकारी एक काफी अछे चयन से सन्तुष्ट होता है।

साइमन की यह भी मान्यता है कि सभी विकल्पों और उनके परिणाम को जानने में लोगों की योग्यता सीमित है और यह सीमा बन्धन पूर्णतः तर्कसंगत निर्णय को असम्भव कर देता है। चूँकि लोगों को भावी घटनाओं के सम्बन्ध में पूरी जानकारी नहीं हो सकती है, इससे वे अपने सीमित ज्ञान के सहारे कम परिपूर्ण निर्णय कर लेते हैं। सीमित जानकारी के कारण लोग ऐसे विकल्प को चुन लेते हैं जो बिल्कुल परिपूर्ण न होकर साधारणतया ठीक होते हैं। ऐसे निर्णयों को साइमन ने सन्तोषजनक निर्णयकहा है। साइमन लिखते हैं कि प्रबन्धक सदैव अनुकूलतम समाधानोंकी खोज कर सकते हैं, किन्तु पर्याप्त रूप से ठीकसमाधानों से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं। विभिन्न प्रकार की सीमाओं के कारण प्रबन्धकों का व्यवहार उच्चतमन होकर केवल सन्तोषप्रदही हो जाता है।

साइमन संयोजिततथा असंयोजितनिर्णयों में स्पष्ट अन्तर करते हैं। संयोजित निर्णय वे हैं जो स्वरूप से दुहराये जाने वाले तथा आम होते हैं। ऐसे निर्णयों के लिए निश्चित प्रक्रिया बनायी जा सकती हैं। प्रत्येक निर्णय पर अलग से विचार करना आवश्यक नहीं। ऐसे निर्णय में गणितीय मापांक तथा कम्प्यूटर निर्णयकर्ता को तार्किक निर्णयों को लेने में मदद कर सकते हैं। इसके विपरीत, असंयोजित निर्णय नये तथा अनबद्ध होते हैं। कोई पहले से तैयार पद्धतियाँ उपलब्ध नहीं होती तथा प्रत्येक प्रश्न या मसले पर अलग से विचार करना होता है।

साइमन के अनुसार निर्णय कार्यों का विशिष्टीकरण मुख्यतः निर्णयन केन्द्रों से तथा निर्णयन केन्द्रों की और पर्याप्त संचार मार्गों के विकास पर निर्भर करता है। अतः संगठन में औपचारिक एवं अनौपचारिक संचार सूत्र होने चाहिए।

किसी परिणाम से सही अनुमान के लिए भविष्य में दृष्टिपात करने की क्षमता होनी चाहिए। सापेक्ष दृष्टि से उचित निर्णय एक ऐसी स्थिति है, जिसमें कुछ विकल्प और उनके कुछ परिणाम ज्ञात होते हैं और उनमें से चयन किया जाता है। साइमन के अनुसार निर्णय लेने के सम्बन्ध में मनुष्य के वास्तविक आचरण का अध्ययन किया जाना चाहिए।

1. निर्णय-निर्माण का अर्थ (Meaning of Decision Making):

वेबस्टर शब्दकोश निर्णय-निर्माण का परिभाषा- अपन मस्तिष्क में कोई मत या काम के तरीके का निर्धारित करने की क्रियाके रूप में देता है । रॉबर्ट टैनेनबॉम के अनुसार निर्णय-निर्माण में- दो या अधिक व्यवहार विकल्पों के समूह में से किसी एक व्यवहार विकल्प का चुनाव शामिल होता है ।

टेरी निर्णय-निर्माण को दो या अधिक संभाव्य विकल्पों में से एक व्यवहार विकल्प को चुननेके रूप में परिभाषित करते हैं । इस तरह, निर्णय-निर्माण का अर्थ है- तमाम विकल्पों में से एक विकल्प चुनाव । यह प्रकृति से मूलत: समस्या का समाधान करने वाला है । निर्णय-निर्माण, नीति-निर्माण से काफी निकटता से जुड़ा है, मगर व एक नहीं है ।

टेरी ने निर्णय व नीति के भेद को निम्न रुप से स्पष्ट किया है- निर्णय आम तौर पर नीति द्वारा स्थापित निर्देशों के ढांचे के भीतर लिए जाते हैं । कोई नीति तुलनात्मक रुप व ज्यादा व्यापक होती है, कई समस्याओं का प्रभावित करती है और बार-बार इस्तेमाल होती है । इसके विपरीत, कोई निर्णय किसी विशेष समस्या पर लागू होता है और इसका इस्तेमाल गैर-निरंतर स्वरूप का होता है ।

क्लासिकीय चिंतकों न योजना, संगठन, तालमेल और नियंत्रण इत्यादि जैसे प्रबंधकीय कामों व जुड़ी एक सर्वव्याप्त गतिविधि के रुप में निर्णय-निर्माण को बहुत महत्व नहीं । फ्रेड लुथांसि के शब्दों में- फेयॉल व अरविक जैसे क्लासिकीय सिद्धांतकार निर्णय-निर्माण से केवल उस हद तक जुड़े थे जिस हद तक यह प्रत्यायोजन और प्राधिकार को प्रभावित करता है, जबकि फ्रेडरिक डब्ल्यू. टेलर ने वैज्ञानिक पद्धति की तरफ संकेत केवल निर्णय लेने के एक आदर्श उपागम के रुप में किया ।

निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया का पहला व्यापक विश्लेषण चेस्टर बर्नार्ड ने दिया । उन्होंने कहा- निर्णय की प्रक्रियाएँ मोटे तौर पर चुनाव को संकीर्ण बनाने की तकनीक हैं ।

निर्णय-निर्माण की साइमन की अवधारणा:

हरबर्ट ए. साइमन सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय विचारक हैं । उन्होंने निर्णय-निर्माण की परिभाषा- कार्यवाहियों के वैकल्पिक रास्तों के बीच सर्वोत्तम तार्किक चुनावके रूप में दी । साइमन के अनुसार निर्णय-निर्माण पूरे संगठन में ही व्याप्त होता है, यानी संगठन के सभी स्तरों पर निर्णय लिए जाते हैं । इसलिए उन्होंने संगठन को निर्णय-निर्माताओं की एक संरचना के रूप में देखा ।

उन्होंने प्रशासन और निर्णय-निर्माण के बीच समानताएँ बताई क्योंकि प्रशासन का हर पहलू निर्णय-निर्माण के इर्द-गिर्द घूमता है । उन्होंने गौर किया कि निर्णय-निर्माण फेयॉल द्वारा POCCC और गुलिक द्वारा ‘POSDCORB’ के रूप में वर्णित सभी प्रशासनिक कार्यों को समेटने वाली व्यापक गतिविधि है ।

साइमन कहते हैं- सिद्धांत विकसित कर लेने से पहले किसी भी विज्ञान के पास अवधारणाएँ होनी चाहिए । निर्णय-निर्माण प्रशासन की सबसे महत्त्वपूर्ण गतिविधि हैकोई भी प्रशासनिक विज्ञान, अन्य किसी भी विज्ञान की तरह शुद्ध रूप से तथ्यात्मक कथनों से सरोकार रखता है । विज्ञान के अध्ययन में नैतिक कथनों का कोई स्थान नहीं होता है ।

संक्षेप में, साइमन की प्रशासन की अवधारणा के दो मूलभूत तत्व हैं:

(i) क्लासिकीय चिंतकों के सिद्धांत उपागम (संरचनात्मक उपागम) के विकल्प के रूप में निर्णय-निर्माण उपागम पर जोर और

(ii) प्रशासन के अध्ययन में आदर्शवादी उपागम के विपरीत आनुभविक उपागम (मूल्य-मुझ उपागम) की वकालत ।

जैसा कि एन. उमापति ठीक ही कहते हैं- साइमन ने निर्णय-निर्माण पर ध्यान केंद्रित करते हुए तार्किक प्रत्यक्षवाद के सिद्धांतों और पद्धतियों के आधार पर प्रशासन की एक नई अवधारणा का प्रस्ताव दिया ।

2. निर्णय-निर्माण का आधार या कारक (Bases or Factors of Decision Making):

सेकलर-हडसन ने बारह ऐसे कारकों की सूची दी है जिन पर निर्णय-निर्माण में विचार किया जाता है:

(a) कानूनी सीमाएँ,

(b) बजट,

(c) लोकनीति,

(d) तथ्य,

(e) इतिहास,

(f) आंतरिक उत्साह,

(g) पूर्वानुमानित भविष्य,

(h) श्रेष्ठतर,

(i) दबाव समूह,

(j) स्टाफ,

(k) कार्यक्रम की प्रकृति और

(l) अधीनस्थ ।

निर्णय-निर्माण के साइमन के आधार:

साइमन के अनुसार, हर निर्णय दो आधारों पर निर्भर होता है- तथ्यात्मक आधार व मूल्य आधार । एक तथ्य वास्तविकता का बयान होता है, जबकि एक मूल्य प्राथमिकता की अभिव्यक्ति । किसी तथ्यात्मक आधार को देखे और मापे जा सकने वाले साधनों से सिद्ध किया जा सकता है ।

अर्थात्, इसकी वैधता की जाँच आनुभविक रूप से की जा सकती है । दूसरी ओर किसी मूल्य आधार को आनुभविक रूप से नहीं आँका जा सकता, यानी इसे मात्र व्यक्तिनिष्ठ रूप से वैध माना जा सकता है । साइमन के अनुसार, मूल्य आधारों का सरोकार कार्यवाही के लक्ष्यों के चुनाव से होता है, जबकि तथ्यात्मक आधारों का संबंध कार्यवाही के माध्यमों के चुनाव से होता है ।

उन्होंने कहा कि, जहाँ तक निर्णय अंतिम लक्ष्यों के चुनाव की ओर ले जाते हैं, उन्हें मूल्य निर्णय’ (‘मूल्यमुख्य रूप से प्रभावी होता है) कहा जा सकता है और जहाँ तक वे निर्णय ऐसे लक्ष्यों के लागू करने को शामिल करते हैं, उन्हें तथ्यात्मक निर्णय’ (यानी तथ्यात्मक अंग मुख्य रूप से प्रभावी होता है ।) कहा जा सकता है ।

3. निर्णय-निर्माण का प्रक्रिया या चरण (Process or Stages of Decision Making):

टेरी निर्णय-निर्माण के चरणों का निम्न क्रम निर्धारित करते हैं:

(i) समस्या का निर्धारण ।

(ii) समस्या की पृष्ठभूमि की सामान्य जानकारी और उसके बारे में विभिन्न उपागम जानना ।

(iii) जो कार्यवाही का सर्वश्रेष्ठ तरीका लगे, उसे बताना ।

(iv) साध्य और अस्थायी निर्णयों की पहचान करना ।

(v) अस्थायी निर्णयों का मूल्यांकन करना ।

(vi) निर्णय लेना और उसे लागू करना ।

(vii) निरंतर काम में जुटे रहना और अगर जरूरी हो, तो प्राप्त परिणामों के प्रकाश में निर्णय को संशोधित करना ।

निर्णय-निर्माण के साइमन के चरण:

साइमन के अनुसार, निर्णय-निर्माण के तीन प्रमुख चरण होते हैं, वे हैं:

i. आसूचना गतिविधि:

साइमन ने निर्णय-निर्माण के प्रथम चरण को (सूचना का सैन्य अर्थ लेते हुए) आसूचना गतिविधि कहा । इसमें निर्णय लेने के अवसरों की खोज शामिल है । साइमन के अनुसार, कार्यपालिकाएँ अपने समय का एक बड़ा हिस्सा नए कामों की माँग करती हुई नई स्थितियों की पहचान करने के लिए आर्थिक, तकनीकी, राजनीतिक व सामाजिक परिवेश के सर्वेक्षण में लगाती हैं ।

ii. डिज़ाइन् गतिविधि:

दूसरे चरण में, जिसे डिज़ाइन् चरण भी कहते हैं, कार्यवाही के संभव रास्तों का आविष्कार, विकास और विश्लेषण होता है । अर्थात कार्यवाही के वैकल्पिक रास्तों की तलाश होती है । साइमन मानते थे कि कार्यपालिकाएँ व्यक्तिगत रूप से या अपने सहयोगियों के साथ, जहाँ निर्णय की जरूरत है वहाँ की स्थिति से निपटने के लिए कार्यवाही के संभव रास्तों के आविष्कार, आकार-निर्धारण और विकास के प्रयास में अपने समय का बड़ा हिस्सा खर्च करती हैं ।

iii. चुनाव गतिविधि:

साइमन ने निर्णय-निर्माण के आखिरी चरण को चुनाव गतिविधि कहा । इसमें दिए गए विकल्पों में से कार्यवाही का एक विशेष रास्ता चुनना शामिल है । साइमन की राय में एक समस्या से निपटने के लिए अपने परिणामों के लिए विकसित और विश्लेषित वैकल्पिक कार्यवाहियों के बीच चुनाव में कार्यपालिकाएँ अपने समय का एक छोटा हिस्सा खर्च करती हैं ।

साइमन के अनुसार, ये तीनों चरण जॉन डेवी द्वारा व्याख्यायित समस्या-समाधान के तीन चरणों से घनिष्ठता के साथ जुड़े हैं । वे हैं- (क) समस्या क्या है, (ख) विकल्प क्या हैं ? (ग) कौन-सा विकल्प सर्वश्रेष्ठ है ? साइमन अंत में कहते हैं कि सामान्यत: आसूचना गतिविधि, डिजायन से पहले और डिजायन गतिविधि चुनाव से पहले होती है । लेकिन चरणों का चक्र इस क्रम से कहीं जटिल होता है । कोई भी विशिष्ट निर्णय लेने में प्रत्येक चरण अपने-आप में एक जटिल निर्णय-निर्माण प्रक्रिया है ।

उदाहरणार्थ डिजायन चरण नई आसूचना गतिविधियों की माँग कर सकता है; किसी भी दिए गए स्तर की समस्याएँ, उप-समस्याएँ पैदा कर सकती हैं जिनके अपने आसूचना, डिजायन और चुनाव चरण होते हैं इत्यादि । चक्रों के भीतर चक्र होते हैं । फिर भी, सांगठनिक निर्णय प्रक्रिया के खुलने के साथ ये तीन मोटे चरण आसानी से पहचाने जा सकते हैं ।

4. निर्णय-निर्माण के वर्गिकरण (Classification of Decision Making):

विभिन्न चिंतकों ने निर्णयों को विभिन्न वर्गों में विभाजित किया है । कुछ वर्गीकरणों का यहाँ उल्लेख किया गया है ।

i. नियोजित व अनियोजित निर्णय:

हरबर्ट ए. साइमन ने निर्णयों को नियोजित व अनियोजित में वर्गीकृत किया है । निर्णय उस सीमा तक नियोजित होते हैं जिस सीमा तक वे दोहरावपूर्ण और नियमित होते हैं, ताकि कोई तय प्रक्रिया उनसे निपटने के लिए निकाली जा सके और हर बार उनसे नए तौर पर निपटना नहीं पड़े । यह पूर्व उदाहरणों के द्वारा निर्णय-निर्माण करना है ।

निर्णय उस सीमा तक अनियोजित होते हैं, जिस सीमा तक वे नए, असंरचनाबद्ध और परिणामात्मक होते हैं । इन समस्याओं से निपटने की कोई बनी-बनाई पद्धति नहीं होती, क्योंकि वे पहले पैदा ही नहीं हुई होतीं, क्योंकि इसकी निश्चित प्रकृति धुँधली या जटिल होती है और क्योंकि यह पहले से निर्धारित उपचार की अपेक्षा रखती है ।

साइमन व मार्च ने कहा है कि वह प्रशासक जो दिनों दिन और दीर्घकालिक योजना दोनों के लिए उत्तरदायी होता है वह अपने समय का ज्यादा हिस्सा नियमित गतिविधियों को देता है । इसका नतीजा दीर्घकालिक नतीजों से बचने या उन्हें टालने में सामने आता है । इस परिघटना को योजना का ग्रेशम नियमकहते हैं । यह कहता है कि नियमितता अनियोजित गतिविधि को स्थानापन्न कर देती है ।

ii. समजात और अद्वितीय निर्णय:

पीटर ड्रकर ने अपनी लोकप्रिय पुस्तक दि प्रैक्टिस ऑफ मैनेजमेंट में निर्णयों को समजात और अद्वितीय निर्णयों में वर्गीकृत किया । यह क्रमश: नियोजित और अनियोजित निर्णयों से मिलता-जुलता है ।

iii. सांगठनिक और व्यक्तिगत निर्णय:

चेस्टर बर्नार्ड ने निर्णयों को सांगठनिक और व्यक्तिगत निर्णयों में वर्गीकृत किया । पहले वाले निर्णय किसी कार्यकारी द्वारा अपनी आधिकारिक क्षमता से लिए जाते हैं । यानि, अपने संगठन के एक सदस्य के रूप में जबकि दूसरे वाले निर्णय किसी कार्यकारी द्वारा अपनी व्यक्तिगत क्षमता से लिए जाते हैं, अपने संगठन के सदस्य की हैसियत से नहीं ।

iv. नीति व कार्य चालन संबंधी निर्णय:

निर्णय को नीति निर्णयों और कार्य चालन संबंधी निर्णयों में बांटा गया है । नीति निर्णयों को रणनीतिक निर्णयों के रूप में भी जाना जाता है । ये निर्णय बुनियादी प्रकृति के होते हैं और पूरे संगठन को प्रभावित करते हैं ।

जाहिर है कि वे शीर्ष प्रबंधन द्वारा लिए जाते हैं । इसके विपरीत, कार्य चालन संबंधी निर्णयों का उद्देश्य नीति निर्णयों को लागू करने का होता है । इसलिए वे निचले प्रबंधन संवर्गों द्वारा लिए जाते हैं । इन्हें कूटनीतिक निर्णयों के रूप में भी जाना जाता है ।

v. व्यक्तिगत और समूह निर्णय:

निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में लगे लोगों की संख्या के आधार पर निर्णयों को व्यक्तिगत और समूह निर्णयों में भी वर्गीकृत किया गया है । व्यक्तिगत निर्णय वे होते हैं जो संगठन में व्यक्तिगत प्रबंधकों द्वारा लिए जाते हैं । वे अपने निर्णयों के परिणामों की पूरी जिम्मेदारी लेते हैं । दूसरी ओर समूह निर्णय वे होते हैं जो संगठन में प्रबंधकों के किसी समूह द्वारा लिए जाते हैं । वे परिणामों की सामूहिक जिम्मेदारी लेते हैं ।

5. निर्णय-निर्माण के मॉडल (Models of Decision Making):

लोक प्रशासन के साहित्य में, निर्णय-निर्माण के चार लोकप्रिय मॉडल हैं- साइमन का परिसीमित तार्किकता मॉडल; लिंडब्लूम का वृद्धिशील मॉडल; एत्जीऑनी का मिश्रित स्कैनिंग मॉडल और ड्रॉर का ऑप्टिमल मॉडल ।

i. साइमन का परिसीमित तार्किकता मॉडल:

हरबर्ट साइमन ने निर्णय-निर्माण के तार्किकता के पहलू का काफी अध्ययन किया । तार्किक निर्णय-निर्माण के उनके मॉडल को व्यवहारीय विकल्प मॉडल भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने क्लासिकीय आर्थिक तार्किकता मॉडलके एक अधिक वास्तविकतापूर्ण-विकल्प के रूप में एक वैकल्पिक मॉडल प्रस्तावित किया । साइमन ने तार्किकता को मूल्यों के अर्थ में श्रेयस्कर व्यवहार विकल्पों के चुनावके रूप में देखा जहाँ व्यवहार के परिणामों का मूल्यांकन हो सकता है ।

साइमन ने विभिन्न प्रकार की तार्किकता में भी भेद किया, उनके अनुसार कोई निर्णय:

(i) वस्तुगत रूप से तार्किक है अगर वास्तव में यह दी गई स्थितियों में दिए गए मूल्यों को सर्वाधिक बनाने के लिए सही व्यवहार है ।

(ii) आत्मपरक रूप से तार्किक है अगर यह विषय के वास्तविक ज्ञान की तुलना में प्राप्ति को सर्वाधिक बनाता है ।

(iii) उस हद तक सचेतन रूप से तार्किक है जहाँ तक लक्ष्यों के अनुसार साधनों में बदलाव एक सचेतन प्रक्रिया हैं ।

(iv) उस हद तक सोचे-समझे रूप में तार्किक है जहाँ तक लक्ष्यों के अनुसार साधनों में बदलाव (व्यक्ति या संगठन द्वारा) सोचे-समझे तौर पर लाया गया है

(v) सांगठनिक रूप से तार्किक है अगर यह संगठन के लक्ष्यों से निर्देशित है ।

(vi) व्यक्तिगत रूप से तार्किक है अगर यह व्यक्ति के लक्ष्यों से निर्देशित है ।

साइमन मानते थे कि प्रशासनिक व्यवहार में संपूर्ण तार्किकता असंभव है । इसलिए, ‘निर्णयों को सर्वाधिक विशाल करनाभी संभव नहीं । वे मानते थे कि किसी सांगठनिक विन्यास में मानव व्यवहार परिसीमित तार्किकता’ (सीमित तार्किकता) से पहचाना जाए जो संतोषप्रद-सक्षम निर्णयोंकी ओर ले जाता है न कि विशालतम बनाने वाले निर्णय’ (सर्वोत्तम बनाने वाले निर्णय) की और । संतोषप्रद-सक्षम निर्णय का अर्थ है कि कोई निर्णय-निर्माता एक ऐसा विकल्प चुनता है जो संतोषजनक या पर्याप्त रूप से अच्छा है ।

संतोषप्रद-सक्षम निर्णयों की ओर ले जाने वाली परिसीमित तार्किकता के लिए निम्न कारक उत्तरदायी हैं:

(i) सांगठनिक उद्देश्यों की गतिमान (न कि स्थिर) प्रकृति ।

(ii) उपलब्ध सूचना को संश्लेश्रित करने (विश्लेषित करने) की सीमित क्षमता के साथ ही साथ अपूर्ण (अपर्याप्त) सूचना ।

(iii) समय और लागत संबंधी बाधाएँ ।

(iv) पर्यावरणीय शक्तियाँ या बाह्य कारक ।

(v) विकल्पों को हमेशा एक क्रमिक प्राथमिकता में प्रमाणित नहीं किया जा सकता ।

(vi) निर्णय निर्माता मौजूद सभी विकल्पों और उनके परिणामों से परिचित नहीं भी हो सकते हैं ।

(vii) निर्णय निर्माण की पूर्वधारणाओं, आदतों आदि जैसे व्यक्तिगत कारक ।

(viii) प्रक्रियाओं, नियमों, संचार मार्गों आदि जैसे सांगठनिक कारक ।

साइमन के निर्णय निर्माण के परिसीमित तार्किकता मॉडल को निम्न रूप में चित्रित किया जा सकता है । उपरोक्त सीमाओं को ध्यान में रखते हुए साइनम ने आर्थिक मनुष्य के विरुद्ध प्रशासनिक मनुष्य का मॉडल प्रस्तावित किया ।

साइमन के अनुसार प्रशासनिक मनुष्य:

(a) विकल्पों के चुनाव में संतुष्ट रहने या उस विकल्प की तलाश करने का प्रयास करता है जो संतोषजनक या पर्याप्त रूप से अच्छा होता है;

(b) मानता है कि जो दुनिया वह देखता है वह असली दुनिया का बुरी तरह सरलीकृत प्रतिरूप है;

(c) सभी संभव विकल्प निर्धारित और सुनिश्चित किए बिना चुनाव कर सकता है कि ये सारे विकल्प हैं क्योंकि वह संतुष्ट रहता है न कि सर्वाधिक बनाता है और

(d) तुलनात्मक रूप से सरल, अनुभव सिद्ध नियम से निर्णय लेने के काबिल होता है क्योंकि वह दुनिया को अपेक्षाकृत खाली मानता है ।

इस प्रकार साइमन का संतोषप्रद-सक्षमप्रशासनिक मनुष्य, क्लासिकीय चिंतकों द्वारा बनाए गए सर्वाधिकीकारकआर्थिक मनुष्य से भिन्न है । वहसंतोष और पर्याप्त रूप से देनेके साथ अंत करता है क्योंकि उसके पाससर्वोत्तम’ (सर्वाधिक) देने की क्षमता नहीं ।

लेकिन, क्रिस आर्गिरिस ने गौर किया है कि तार्किकता पर जोर देकर साइमन निर्णय-निर्माण में अंतर्दृष्टि, परंपरा और आस्था की भूमिका को नहीं समझ पाए हैं । वे कहते हैं कि साइमन का सिद्धांत संतोष और पर्याप्त रूप से देनेकी अयोग्यता को तार्किक बनाने में इस्तेमाल होता है ।

नॉर्टन ई. लॉग और फिलिप सेल्जनिक दलील देते हैं कि साइमन का तथ्य और मूल्यों में भेद एक नए छद्म वेश में परित्यक्त राजनीति-प्रशासन द्विभाजन को ही पेश करता है और नौकरशाही को एक तटस्थ औजार समझता है ।

ii. लिंडब्लॉम का वृद्धिशील मॉडल:

चार्ल्स ई. लिंड-ब्लॉम ने अपने लेख दि साइंस ऑफ मडलिंग थ्रू (1959) में निर्णय-निर्माण के वृद्धिशील मॉडलकी वकालत की । यह हरबर्ट साइमन केतार्किक व्यापक मॉडलके ठीक विपरीत है । लिंडब्लॉम कहते हैं कि प्रशासन में वास्तविक निर्णय-निर्माण अपनी सैद्धांतिक व्याख्या से बिल्कुल अलग है । वे तार्किक व्यापक मॉडल में व्यावहारिक समस्याओं की पहचान करते हैं ।

वे धन, समय, सूचना, राजनीति व ऐसी अन्य सीमाओं पर जोर देते हैं जो प्रशासन में वास्तविक निर्णय-निर्माण प्रक्रिया का संचालन करती हैं । लिंडब्लॉम की राय में निर्णय-निर्माता हमेशा मौजूदा कार्यक्रमों और नीतियों को जोड़-जाड़कर चलाते रहते हैं ।

वे कहते हैं कि वास्तव में निर्णय-निर्माण में जो घटित होता है वह है-वृद्धिशीलतायानी, कुछ सुधारों के साथ पहले की ही गतिविधियों का जारी रहना । वृद्धिशील मॉडल को शाखा तकनीकया क्रमिक सीमित तुलनाओं का मॉडलया चरणबद्ध निर्णय-निर्माणभी कहते हैं ।

इस प्रकार, लिंडब्लॉम मानते हैं कि प्रशासक भावी निर्णयों के लिए अतीत की गतिविधियों और अनुभवों का प्रयोग करते हैं । प्रशासन में वास्तविक निर्णय-निर्माण प्रक्रिया की व्याख्या करने के लिए उन्होंने दो अवधारणाओं का प्रयोग किया- सीमांतीय वृद्धिशीलताऔर पक्षधर परस्पर व्यवस्थापन

iii. एत्जिऑनी का मिश्रित-स्कैनिंग मॉडल:

1967 में प्रकाशित अपने लेख मिक्स्ड स्कैनिंग: ए थर्ड अप्रोच टू डिसिजन-मेकिंग में अमिताई एत्जिऑनी ने एक मध्यवर्ती मॉडल का सुझाव दिया है जो दोनों तार्किक व्यापक मॉडल (तार्किकतावाद) और वृद्धिशील मॉडल (वृद्धिशीलता) के तत्वों को जोड़ता है । एत्जिऑनी मोटे तौर पर लिंडब्लॉम द्वारा की गई तार्किक मॉडल की आलोचना से सहमत हैं ।

लेकिन वे यह भी कहते हैं कि वृद्धिशील मॉडल में दो कमियाँ हैं:

(क) यह सामाजिक रचनात्मकता को हतोत्साहित करता है और इस प्रकार उपागम में पक्षधर है और

(ख) यह बुनियादी निर्णयों पर नहीं लागू हो सकता । इस प्रकार वे एक मिश्रित-स्कैनिंग मॉडल का समर्थन करते हैं ।

iv. ड्रॉर का ऑप्टिमल मॉडल:

येजकेल ड्रॉर ने अपनी पुस्तक पब्लिक पॉलिसी-मेकिंग री-एक्जैमिंडमें नीति-निर्माण (निर्णय-निर्माण) और नीति विश्लेषण के एक ऑप्टिमल (अनुकूलतम) उपागम का सुझाव दिया । वे दावा करते हैं कि उनका ऑप्टिमल मॉडल निर्णय-निर्माण के सभी मौजूदा मानक मॉडलों से श्रेष्ठतर है और आर्थिक रूप से तार्किक मॉडल और तार्किकेतर मॉडल का मिश्रण है । ड्रॉर का ऑप्टिमल मॉडल निर्णय-निर्माण का एक तार्किक मॉडल है ।

ड्रॉर के अनुसार, इसकी मुख्य चारित्रिक विशेषताएँ हैं:

(i) यह गुणात्मक है, परिमाणात्मक नहीं ।

(ii) यह तार्किक और तार्किकेतर, दोनों तत्वों को समेटता है ।

(iii) यह आर्थिक तर्क के लिए बुनियादी तर्क है ।

(iv) इसका सरोकार पश्च नीति निर्माण (Metapolicy Making) से है ।

(v) इसमें प्रतिपुष्टि (Feedback) निहित होती है ।

ड्रॉर कहते हैं कि ऑप्टिमल मॉडल के तीन प्रमुख चरण होते हैं अर्थात्, पश्च नीति-निर्माण, नीति-निर्माण और उत्तर नीति-निर्माण । ड्रॉर नीति विज्ञान के तीव्र विकास की वकालत करते हैं ताकि समाज की गंभीर समस्याओं का संतोषप्रद समाधान किया जा सके ।

उनके शब्दों में- नीति विज्ञान को आंशिक रूप से उस शिक्षा शाखा के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो नीति ज्ञान की खोज करती है, जो सामान्य नीति मुद्दे के ज्ञान और नीति-निर्माण ज्ञान की तलाश करें और उन्हें एक विशिष्ट अध्ययन के रूप में एकीकृत करें ।नीति मुद्दे के ज्ञान का सरोकार उस ज्ञान से है जो विशेष-नीति से जुड़ा होता है, जबकि नीति निर्माण ज्ञान का सरोकार नीति-निर्माण गतिविधि की पूरी व्यवस्था से होता है ।

रुमकी बसु के शब्दों में ड्रॉर सभी मौजूदा सूचनाओं और वैज्ञानिक तकनीक के सर्वाधिक उपयोग के आधार पर लक्ष्यों, मूल्यों, विकल्पों, लागतों और लाभों के एक विवेक संगत मूल्यांकन के जरिए सर्वश्रेष्ठ नीति को अपनाने की वकालत करते हैं । वह प्रभावी नीति विश्लेषण की सहायता के लिए तार्किकेतर सामग्रियों के इस्तेमाल का भी सुझाव देते हैं ।

निर्णय लेने के शीर्ष 3 मॉडल

निर्णय लेने के शीर्ष 3 मॉडल | Top 3 Models of Decision Making. Read this article in Hindi to learn about the top three models of decision making. The models are:- 1. लिंडब्लॉंम का वृद्धिशील मॉडल (Incremental Model of Lindblom) 2. एत्जीयोनी का मिश्रित स्कैनिंग मॉडल (Mixed Scanning Model) 3. ड्रोर का दृष्टतम प्रतिमान (Dror’s Optimal Model of Decision Making).

1. लिंडब्लॉंम का वृद्धिशील मॉडल (Incremental Model of Lindblom):

दि साइंस आफॅ मॉडलिंग थ्रू” (1959) नामक लेख में चार्ल्स लिंडब्लॉम नेनिर्णयन का वृद्धिशील मॉडलदिया जो साइमन के तार्किक मॉडलका ठीक उलट है । इसे शाखा तकनीक”, ”क्रमिक सीमित तुलनाओं का मॉडल”, ”सीढी दर सीढी निर्णय निर्माणऔर निर्णय निर्माण में सुधार सिद्धांतभी कहते हैं ।

इस मॉडल की मान्यताएं हैं:

(a) निर्णय निर्माण में सिद्धांत और व्यवहार में अन्तर होता ।

(b) निर्णय में सीमित तार्किकता के स्थान पर वृद्धिशील तार्किकता पायी जाती है ।

(c) प्रशासनिक निर्णयों की नियम सीमाएं होती है जो धन समय, सूचना, राजनीति जैसे अनेक मुद्दों और कारकों से उत्पन्न होती है ।

(d) प्रशासकगण भावी निर्णय लेने के लिये पुरानी गतिविधियों, अनुभव आदि का उपयोग करते है ।

(e) वृद्धिशीलता- निर्णयकर्ता वर्तमान कार्यों, नीतियों को ही सुधार कर, उसमें जोड़कर नयी नीतियों के रूप प्रस्तुत करते हैं । इस प्रकार लिंडब्लॉम के अनुसार निर्णय यदि कुछ है तो मात्र वृद्धिशीलता ।

लिंडब्लॉम समीकरण:

निर्णय = पुरानी या वर्तमान नीति + सुधार (नया तत्व जोड़ना या कुछ घटाना) ।

इस प्रकार यह यथास्थितिवादी के स्थान पर प्रगतिशीलता का पोषक है ।

वास्तविक निर्णय निर्माण:

लिंडब्लॉम ने वास्तविक निर्णय निर्माण की व्याख्या के लिये दो अवधारणाओं का इस्तेमाल किया ।

(1) सीमांतीय वृद्धिशीलता (Marginal Incrementalism)

(2) पक्षधर परस्पर व्यवस्थापन (Partisan Mutual Adjustment)

2. एत्जीयोनी का मिश्रित स्कैनिंग मॉडल (Mixed Scanning Model):

(i) एत्जीयोनी ने साइमन के तार्किक व्यवहारिक मॉडल और लिंडब्लॉम के वृद्धिशीलमॉडल दोनों को समन्वित कर एसा मॉडल दिया जिसमें दोनों मॉडलों की विशेषताओं को लेने तथा दोनों की कमियों को दूर करने का प्रयास दिखायी देता हैं ।

(ii) इसीलिये एत्जीयोनी ने अपने लेख मिक्सड स्केनिंग: थर्ड एप्रोच टू डिसिजन मेकिंग” (1967) में अपने मॉडल को मिक्सड स्कनिंग माडल कहा है ।

(iii) एत्जीयोनी ने साइमन मॉडल की उन्ही कमियों को गिनाया जो लिंडब्लॉम ने बतायी ।

(iv) लेकिन एत्जीयोनी ने लिंडब्लॉम मॉडल की भी दो कमियां बतायी:

1. यह सामाजिक रचनात्मकता को हतोत्साहित करता है और इस तरह अपने तरीके में पक्षपाती है ।

2. यह मूलभूत निर्णयों पर लागू नहीं हो सकता अर्थात मूल निर्णयों पर आधारित बाद के निर्णयों की ही बात करना है ।

(v) अतः एत्जीयोनी का मिक्सड-स्कैनिंग मॉडल तार्किकता, व्यावहारिकता, परिस्थिति, मूल्य और तथ्य जैसे तत्वों को समाहित करता है ।

3. ड्रोर का दृष्टतम प्रतिमान (Dror’s Optimal Model of Decision Making):

पब्लिक पालिसी मेकिंग- री-एक्जामिंडनामक अपनी पुस्तक में प्रसिद्ध नीति विश्लेषक यह्जकोल ड्रोर ने यह निर्णय मॉडल प्रस्तुत किया ।

इसके दो मुख्य तत्व हैं:

(I) नीति निर्माण और

(II) नीति विश्लेषण

ड्रोर के अनुसार प्रत्येक नीति का निर्माण ही निर्णय है । नीति निर्माण का एक भाग नीति विश्लेषण होता है ।

ड्रोर के आप्टिमल मॉडल की विशेषताएँ:

ड्रोर के अनुसार यह आर्थिक आधार पर तार्किक और तार्किकेतर दोनों मॉडल का मिश्रण है ।

इसकी 5 मुख्य विशेषताएँ है:

1. इसमें तार्किकता और अतिरिक्त तार्किकता दोनों तत्वों को स्थान दिया जाता है ।

2. यह गुणात्मक है, परिणात्मक नहीं (Quantitative, Not Quantitative) अर्थात इसमें मात्रा के स्थान पर गुणों पर बल दिया जाता है ।

3. यह आर्थिक तर्क के लिये आधारभूत तर्क है । अर्थात इसमें आधारभूत तार्किकता से आर्थिक तार्किकता की तरफ प्रेरणा है ।

4. इसका सम्बन्ध पश्चनीति निर्माण (Meta Policy Making) है । अर्थात वास्तविक नीति निर्माण के अतिरिक्त अन्य नीतियों पर भी विचार करता है ।

5. इसमें प्रतिप्रेषण (Feedback) की व्यवस्था है । नीतियों पर प्रतिक्रिया जानकर उनमें तदनुरूप संशोधन किया जाता है ।

तीन चरण:

ड्रोर ने अपने मॉडल के 3 चरण बताये हैं:

 1. पश्च नीति निर्माण (Meta Policy Making)

2. नीति निर्माण (Policy Making)

3. उत्तर नीति निर्माण (Post Policy Making)

नीति विज्ञान और नीति निर्माण: डोर का सम्पूर्ण दर्शन नीतिपर केन्द्रीत है । वे नीति को श्रेष्ठ स्तर पर देखना चाहते हैं और इसीलियेनीति विज्ञानके तीव्र विकास की जरूरत प्रतिपादित करते हैं । ड्रोर के अनुसार समाज जिन गंभीर समस्याओं से ग्रस्त है, उनका समाधान नीति विज्ञान में ही निहित है ।

ड्रोर के अनुसार नीति विज्ञान वह विषय है जो नीति ज्ञान की खोज करें ओर नीति ज्ञान के अन्तर्गत दो प्रमुख तत्व हैं:

1. नीति मुद्‌दे का ज्ञान अर्थात नीति विशेष से संबंधित ज्ञान

2. नीति निर्माण का ज्ञान अर्थात नीति निर्माण की सम्पूर्ण व्यवसाठा की जानकारी ।

 

 

 

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